स्थावर - जंगमस्वरूप समस्त द्रव्यगुणपर्यायरूप विषयों सम्बन्धी प्रकाश्य - प्रकाशकादि
विकल्पोंसे अति दूर वर्तता हुआ, स्वस्वरूपसंचेतन जिसका लक्षण है ऐसे प्रकाश द्वारा सर्वथा अंतर्मुख होनेके कारण, आत्मा निरन्तर अखण्ड - अद्वैत - चैतन्यचमत्कारमूर्ति रहता है ।
[अब इस १६५वीं गाथाकी टीका पूर्ण करते हुए टीकाकार मुनिराज श्लोक
कहते हैं : ]
[श्लोकार्थ : — ] निश्चयसे आत्मा स्वप्रकाशक ज्ञान है; जिसने बाह्य आलंबन नष्ट
निश्चयनयेन स्वरूपाख्यानमेतत् ।
निश्चयनयेन स्वप्रकाशकत्वलक्षणं शुद्धज्ञानमिहाभिहितं तथा सकलावरणप्रमुक्त शुद्ध-
दर्शनमपि स्वप्रकाशकपरमेव । आत्मा हि विमुक्त सकलेन्द्रियव्यापारत्वात् स्वप्रकाशकत्वलक्षण-
यद्यपि व्यवहारसे एक समयमें तीन काल सम्बन्धी पुद्गलादि द्रव्यगुणपर्यायोंको
जाननेमें समर्थ सकल - विमल केवलज्ञानमयत्वादि विविध महिमाओंका धारण करनेवाला है,
तथापि वह भगवान, केवलदर्शनरूप तृतीय लोचनवाला होने पर भी, परम निरपेक्षपनेके कारण निःशेषरूपसे (सर्वथा ) अन्तर्मुख होनेसे केवल स्वरूपप्रत्यक्षमात्र व्यापारमें लीन ऐसे निरंजन निज सहजदर्शन द्वारा सच्चिदानन्दमय आत्माको निश्चयसे देखता है (परन्तु
केवलावबोधमयत्वादिविविधमहिमाधारोऽपि स भगवान् केवलदर्शनतृतीयलोचनोऽपि परमनिर- पेक्षतया निःशेषतोऽन्तर्मुखत्वात् केवलस्वरूपप्रत्यक्षमात्रव्यापारनिरतनिरंजननिजसहजदर्शनेन
लोकालोकको नहीं ) — ऐसा जो कोई भी शुद्ध अन्तःतत्त्वका वेदन करनेवाला
(जाननेवाला, अनुभव करनेवाला ) परम जिनयोगीश्वर शुद्धनिश्चयनयकी विवक्षासे कहता है, उसे वास्तवमें दूषण नहीं है ।
[अब इस १६६ वीं गाथाकी टीका पूर्ण करते हुए टीकाकार मुनिराज श्लोक
कहते हैं : ]
[श्लोकार्थ : — ] (❃निश्चयसे ) आत्मा सहज परमात्माको देखता है — कि जो
परमात्मा एक है, विशुद्ध है, निज अन्तःशुद्धिका आवास होनेसे (केवलज्ञानदर्शनादि ) महिमाका धारण करनेवाला है, अत्यन्त धीर है और निज आत्मामें अत्यन्त अविचल होनेसे सर्वदा अन्तर्मग्न है । स्वभावसे महान ऐसे उस आत्मामें ❃व्यवहारप्रपंच है ही नहीं ।
(अर्थात् निश्चयसे आत्मामें लोकालोकको देखनेरूप व्यवहारविस्तार है ही नहीं ) ।२८२।
वेदी परमजिनयोगीश्वरो वक्ति तस्य च न खलु दूषणं भवतीति ।
❃यहाँ निश्चय-व्यवहार सम्बन्धी ऐसा समझना कि — जिसमें स्वकी ही अपेक्षा हो वह निश्चयकथन है और
जिसमें परकी अपेक्षा आये वह व्यवहारकथन है; इसलिये केवली भगवान लोकालोकको — परको जानते-
देखते हैं ऐसा कहना वह व्यवहारकथन है और केवली भगवान स्वात्माको जानते-देखते हैं ऐसा कहना वह निश्चयकथन है । यहाँ व्यवहारकथनका वाच्यार्थ ऐसा नहीं समझना कि जिसप्रकार छद्मस्थ जीव
लोकालोकको जानता-देखता ही नहीं है उसीप्रकार केवली भगवान लोकालोकको जानते-देखते ही नहीं हैं । छद्मस्थ जीवके साथ तुलनाकी अपेक्षासे तो केवलीभगवान लोकालोकको जानते-देखते हैं वह बराबर
सत्य है — यथार्थ है, क्योंकि वे त्रिकाल सम्बन्धी सर्व द्रव्यगुणपर्यायोंको यथास्थित बराबर परिपूर्णरूपसे
वास्तवमें जानते-देखते हैं । ‘केवली भगवान लोकालोकको जानते-देखते हैं’ ऐसा कहते हुए परकी अपेक्षा
आती है इतना ही सूचित करनेके लिये, तथा केवली भगवान जिसप्रकार स्वको तद्रूप होकर निजसुखके संवेदन सहित जानते-देखते हैं उसीप्रकार लोकालोकको (परको) तद्रूप होकर परसुखदुःखादिके संवेदन सहित नहीं जानते-देखते, परन्तु परसे बिलकुल भिन्न रहकर, परके सुखदुःखादिका संवेदन किये बिना जानते-देखते हैं इतना ही सूचित करनेके लिये उसे व्यवहार कहा है ।
समस्त गुणों और पर्यायोंसे संयुक्त पूर्वसूत्रोक्त (१६७वीं गाथामें कहे हुए ) मूर्तादि
द्रव्योंको जो नहीं देखता; — अर्थात् मूर्त द्रव्यके मूर्त गुण होते हैं, अचेतनके अचेतन गुण
होते हैं, अमूर्तके अमूर्त गुण होते हैं, चेतनके चेतन गुण होते हैं; षट् (छह प्रकारकी ) हानिवृद्धिरूप, सूक्ष्म, परमागमके प्रमाणसे स्वीकार - करनेयोग्य अर्थपर्यायें छह द्रव्योंको
साधारण हैं, नरनारकादि व्यंजनपर्यायें पांच प्रकारकी ❃संसारप्रपंचवाले जीवोंको होती हैं,
पुद्गलोंको स्थूल - स्थूल आदि स्कन्धपर्यायें होती हैं और धर्मादि चार द्रव्योंको शुद्ध पर्यायें
होती हैं; इन गुणपर्यायोंसे संयुक्त ऐसे उस द्रव्यसमूहको जो वास्तवमें नहीं देखता; — उसे
(भले वह सर्वज्ञताके अभिमानसे दग्ध हो तथापि ) संसारियोंकी भाँति परोक्ष दृष्टि है ।
[अब इस १६८ वीं गाथाकी टीका पूर्ण करते हुए टीकाकार मुनिराज श्लोक
कहते हैं : ]
[श्लोकार्थ : — ] सर्वज्ञताके अभिमानवाला जो जीव शीघ्र एक ही कालमें तीन
अत्र केवलद्रष्टेरभावात् सकलज्ञत्वं न समस्तीत्युक्त म् ।
भगवान [लोकालोकौ ] लोकालोकको [जानाति ] जानते हैं, [न एव आत्मानम् ] आत्माको नहीं — [एवं ] ऐसा [यदि ] यदि [कः अपि भणति ] कोई कहे तो [तस्य च
किं दूषणं भवति ] उसे क्या दोष है ? (अर्थात् कोई दोष नहीं है । )
टीका : — यह, व्यवहारनयकी प्रगटतासे कथन है ।
‘पराश्रितो व्यवहारः (व्यवहारनय पराश्रित है )’ ऐसे (शास्त्रके) अभिप्रायके
कारण, व्यवहारसे व्यवहारनयकी प्रधानता द्वारा (अर्थात् व्यवहारसे व्यवहारनयको प्रधान करके), ‘सकल-विमल केवलज्ञान जिनका तीसरा लोचन है और अपुनर्भवरूपी सुन्दर कामिनीके जो जीवितेश हैं ( – मुक्तिसुन्दरीके जो प्राणनाथ हैं ) ऐसे भगवान छह द्रव्योंसे
व्याप्त तीन लोकको और शुद्ध - आकाशमात्र अलोकको जानते हैं, निरुपराग (निर्विकार )
शुद्ध आत्मस्वरूपको नहीं ही जानते’ — ऐसा यदि व्यवहारनयकी विवक्षासे कोई जिननाथके
लोयालोयं जाणइ अप्पाणं णेव केवली भगवं ।
जइ कोइ भणइ एवं तस्स य किं दूसणं होइ ।।१६९।।
लोकालोकौ जानात्यात्मानं नैव केवली भगवान् ।
यदि कोऽपि भणति एवं तस्य च किं दूषणं भवति ।।१६९।।
व्यवहारनयप्रादुर्भावकथनमिदम् ।
सकलविमलकेवलज्ञानत्रितयलोचनो भगवान् अपुनर्भवकमनीयकामिनीजीवितेशः
षड्द्रव्यसंकीर्णलोकत्रयं शुद्धाकाशमात्रालोकं च जानाति, पराश्रितो व्यवहार इति मानात्
व्यवहारेण व्यवहारप्रधानत्वात्, निरुपरागशुद्धात्मस्वरूपं नैव जानाति, यदि व्यवहारनयविवक्षया
भगवान केवलि लोक और अलोक जाने, आत्मना ।
— यदि कोई यों कहता अरे उसमें कहो है दोष क्या ? १६९।।
गाथा : १७० अन्वयार्थ : — [ज्ञानं ] ज्ञान [जीवस्वरूपं ] जीवका स्वरूप है,
[तस्मात् ] इसलिये [आत्मा ] आत्मा [आत्मकं ] आत्माको [जानाति ] जानता है; [आत्मानं न अपिजानाति ] यदि ज्ञान आत्माको न जाने तो [आत्मनः ] आत्मासे [व्यतिरिक्तम् ] व्यतिरिक्त (पृथक् ) [भवति ] सिद्ध हो !
टीका : — यहाँ (इस गाथामें ) ‘जीव ज्ञानस्वरूप है’ ऐसा वितर्कसे (दलीलसे )
कहा है ।
प्रथम तो, ज्ञान वास्तवमें जीवका स्वरूप है; उस हेतुसे, जो अखण्ड अद्वैत स्वभावमें
लीन है, जो १निरतिशय परम भावना सहित है, जो मुक्तिसुन्दरीका नाथ है और बाह्यमें जिसने
२कौतूहल व्यावृत्त किया है (अर्थात् बाह्य पदार्थों सम्बन्धी कुतूहलका जिसने अभाव किया
है ) ऐसे निज परमात्माको कोई आत्मा — भव्य जीव — जानता है । — ऐसा यह वास्तवमें
स्वभाववाद है । इससे विपरीत वितर्क ( – विचार ) वह वास्तवमें विभाववाद है, प्राथमिक
वह (विपरीत वितर्क — प्राथमिक शिष्यका अभिप्राय ) किसप्रकार है ? (वह
इसप्रकार है : — ) ‘पूर्वोक्तस्वरूप (ज्ञानस्वरूप ) आत्माको आत्मा वास्तवमें जानता नहीं
है, स्वरूपमें अवस्थित रहता है ( – आत्मामें मात्र स्थित रहता है ) । जिसप्रकार
उष्णतास्वरूप अग्निके स्वरूपको (अर्थात् अग्निको ) क्या अग्नि जानती है ? (नहीं ही जानती । ) उसीप्रकार ज्ञानज्ञेय सम्बन्धी विकल्पके अभावसे यह आत्मा आत्मामें (मात्र )
स्थित रहता है ( – आत्माको जानता नहीं है ) ।’
(उपरोक्त वितर्कका उत्तर : — ) ‘हे प्राथमिक शिष्य ! अग्निकी भाँति क्या यह
आत्मा अचेतन है (कि जिससे वह अपनेको न जाने ) ? अधिक क्या कहा जाये ? (संक्षेपमें, ) यदि उस आत्माको ज्ञान न जाने तो वह ज्ञान, देवदत्त रहित कुल्हाड़ीकी भाँति,
❃
अर्थक्रियाकारी सिद्ध नहीं होगा, और इसलिये वह आत्मासे भिन्न सिद्ध होगा ! वह तो
(अर्थात् ज्ञान और आत्माकी सर्वथा भिन्नता तो ) वास्तवमें स्वभाववादियोंको संमत नहीं है । (इसलिये निर्णय कर कि ज्ञान आत्माको जानता है । )’
इसीप्रकार (आचार्यवर ) श्री गुणभद्रस्वामीने (आत्मानुशासनमें १७४वें श्लोक
गाथा : १७२ अन्वयार्थ : — [जानन् पश्यन् ] जानते और देखते हुए भी,
[केवलिनः ] केवलीको [ईहापूर्वं ] इच्छापूर्वक (वर्तन ) [न भवति ] नहीं होता; [तस्मात् ] इसलिये उन्हें [केवलज्ञानी ] ‘केवलज्ञानी’ कहा है; [तेन तु ] और इसलिये [सः अबन्धकःभणितः ] अबन्धक कहा है ।
टीका : — यहाँ, सर्वज्ञ वीतरागको वांछाका अभाव होता है ऐसा कहा है ।
भगवान अर्हंत परमेष्ठी सादि - अनन्त अमूर्त अतीन्द्रियस्वभाववाले शुद्ध-
सद्भूतव्यवहारसे केवलज्ञानादि शुद्ध गुणोंके आधारभूत होनेके कारण विश्वको निरन्तर जानते हुए भी और देखते हुए भी, उन परम भट्टारक केवलीको मनप्रवृत्तिका (मनकी प्रवृत्तिका, भावमनपरिणतिका ) अभाव होनेसे इच्छापूर्वक वर्तन नहीं होता; इसलिये वे भगवान ‘केवलज्ञानी’ रूपसे प्रसिद्ध हैं; और उस कारणसे वे भगवान अबन्धक हैं
।
इसीप्रकार (श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत ) श्री प्रवचनसारमें (५२वीं गाथा
द्वारा ) कहा है कि : —
‘‘[गाथार्थ : — ] (केवलज्ञानी ) आत्मा पदार्थोंको जानता हुआ भी उन - रूप
परिणमित नहीं होता, उन्हें ग्रहण नहीं करता और उन पदार्थोंरूपमें उत्पन्न नहीं होता इसलिये उसे अबन्धक कहा है ।’’
स्थित सर्व पदार्थोंको जानते हुए भी, तथा देखते हुए भी, मोहके अभावके कारण समस्त परको ( – किसी भी परपदार्थको ) नित्य ( – कदापि ) ग्रहण नहीं ही करते; (परन्तु )
जिन्होंने ज्ञानज्योति द्वारा मलरूप क्लेशका नाश किया है ऐसे वे जिनेश सर्व लोकके एक साक्षी ( – केवल ज्ञातादृष्टा ) हैं ।२८८।
बन्धका कारण [भवति ] है; [ईहारहितं वचनं ] (ज्ञानीको ) इच्छारहित वचन होता है [तस्मात् ] इसलिये [ज्ञानिनः ] ज्ञानीको (केवलज्ञानीको ) [हि ] वास्तवमें [बंधः न ] बंध नहीं है ।
टीका : — यहाँ वास्तवमें ज्ञानीको (केवलज्ञानीको ) बन्धके अभावका स्वरूप
कहा है ।
सम्यग्ज्ञानी (केवलज्ञानी ) जीव कहीं कभी स्वबुद्धिपूर्वक अर्थात् स्वमन-
परिणामपूर्वक वचन नहीं बोलता । क्यों ? ‘‘अमनस्काः केवलिनः (केवली मनरहित हैं )’’
ऐसा (शास्त्रका) वचन होनेसे । इस कारणसे (ऐसा समझना कि) — जीवको
मनपरिणतिपूर्वक वचन बन्धका कारण है ऐसा अर्थ है और मनपरिणतिपूर्वक वचन तो केवलीको होता नहीं है; (तथा) इच्छापूर्वक वचन ही ❃
साभिलाषस्वरूप जीवको बन्धका
कारण है और केवलीके मुखारविन्दसे निकलती हुई, समस्त जनोंके हृदयको आह्लादके कारणभूत दिव्यध्वनि तो अनिच्छात्मक (इच्छारहित) होती है; इसलिये सम्यग्ज्ञानीको (केवलज्ञानीको) बन्धका अभाव है ।
[अब इन १७३ - १७४वीं गाथाओंकी टीका पूर्ण करते हुए टीकाकार मुनिराज
तीन श्लोक कहते हैं :]
ईहापूर्वं वचनं जीवस्य च बंधकारणं भवति ।
ईहारहितं वचनं तस्माज्ज्ञानिनो न हि बंधः ।।१७४।।
इह हि ज्ञानिनो बंधाभावस्वरूपमुक्त म् ।
सम्यग्ज्ञानी जीवः क्वचित् कदाचिदपि स्वबुद्धिपूर्वकं वचनं न वक्ति स्वमनःपरिणाम-
नहीं ही है; इसलिये वे प्रगट - महिमावंत हैं और समस्त लोकके एक (अनन्य) नाथ हैं ।
उन्हें द्रव्यभावस्वरूप ऐसा यह बन्ध किसप्रकार होगा ? (क्योंकि) मोहके अभावके कारण उन्हें वास्तवमें समस्त रागद्वेषादि समूह तो है नहीं ।२८९।
[श्लोकार्थ : — ] तीन लोकके जो गुरु हैं, चार कर्मोंका जिन्होंने नाश किया है और
समस्त लोक तथा उसमें स्थित पदार्थसमूह जिनके सद्ज्ञानमें स्थित हैं, वे (जिन भगवान) एक ही देव हैं । उन निकट (साक्षात्) जिन भगवानमें न तो बन्ध है न मोक्ष, तथा उनमें न
तो कोई १मूर्छा है न कोई २चेतना (क्योंकि द्रव्यसामान्यका पूर्ण आश्रय है ) ।२९०।
[श्लोकार्थ : — ] इन जिन भगवानमें वास्तवमें धर्म और कर्मका प्रपंच नहीं है
(अर्थात् साधकदशामें जो शुद्धि और अशुद्धिके भेदप्रभेद वर्तते हैं वे जिन भगवानमें नहीं
खड़े रहना, बैठना और विहार [ईहापूर्वं ] इच्छापूर्वक [न भवन्ति ] नहीं होते, [तस्मात् ] इसलिये [बंध नभवति ] उन्हें बन्ध नहीं है; [मोहनीयस्य ] मोहनीयवश जीवको [साक्षार्थम् ] इन्द्रियविषयसहितरूपसे बन्ध होता है ।
टीका : — यह, केवली भट्टारकको मनरहितपनेका प्रकाशन है (अर्थात् यहाँ
इच्छापूर्वक कोई भी वर्तन नहीं होता; इसलिये वे भगवान (कुछ) चाहते नहीं हैं, क्योंकि मनप्रवृत्तिका अभाव है; अथवा, वे इच्छापूर्वक खड़े नहीं रहते, बैठते नहीं हैं अथवा श्रीविहारादिक नहीं करते, क्योंकि ‘अमनस्काः केवलिनः (केवली मनरहित हैं )’ ऐसा शास्त्रका वचन है । इसलिये उन तीर्थंकर - परमदेवको द्रव्यभावस्वरूप चतुर्विध बंध
ठाणणिसेज्जविहारा ईहापुव्वं ण होइ केवलिणो ।
तम्हा ण होइ बंधो साक्खट्ठं मोहणीयस्स ।।१७५।।
स्थाननिषण्णविहारा ईहापूर्वं न भवन्ति केवलिनः ।
तस्मान्न भवति बंधः साक्षार्थं मोहनीयस्य ।।१७५।।
केवलिभट्टारकस्यामनस्कत्वप्रद्योतनमेतत् ।
भगवतः परमार्हन्त्यलक्ष्मीविराजमानस्य केवलिनः परमवीतरागसर्वज्ञस्य ईहापूर्वकं न
किमपि वर्तनम्; अतः स भगवान् न चेहते मनःप्रवृत्तेरभावात्; अमनस्काः केवलिनः
इति वचनाद्वा न तिष्ठति नोपविशति न चेहापूर्वं श्रीविहारादिकं करोति । ततस्तस्य
अभिलाषयुक्त विहार, आसन, स्थान जिनवरको नहीं ।
निर्बन्ध इससे, बन्ध करता मोह - वश साक्षार्थ ही ।।१७५।।
अविचल स्थितिरूप है उसके द्वारा — आयुकर्मका क्षय होने पर, वेदनीय, नाम और गोत्र
नामकी शेष प्रकृतियोंका सम्पूर्ण नाश होता है (अर्थात् भगवानको शुक्लध्यान द्वारा आयुकर्मका क्षय होने पर शेष तीन कर्मोंका भी क्षय होता है और सिद्धक्षेत्रकी ओर स्वभावगतिक्रिया होती है ) । शुद्धनिश्चयनयसे सहजमहिमावाले निज स्वरूपमें लीन होने पर
भी व्यवहारसे वे भगवान अर्ध क्षणमें (समयमात्रमें ) लोकाग्रमें पहुँचते हैं ।
[अब इस १७६वीं गाथाकी टीका पूर्ण करते हुए टीकाकार मुनिराज तीन श्लोक
कहते हैं : ]
[श्लोकार्थ : — ] जो छह अपक्रम सहित हैं ऐसे भववाले जीवोंके
( – संसारियोंके ) लक्षणसे सिद्धोंका लक्षण भिन्न है, इसलिये वे सिद्ध ऊ र्ध्वगामी हैं और
सदा शिव (निरन्तर सुखी) हैं ।२९३।
[श्लोकार्थ : — ] बन्धका छेदन होनेसे जिनकी अतुल महिमा है ऐसे (अशरीरी
और लोकाग्रस्थित) सिद्धभगवान अब देवों और विद्याधरोंके प्रत्यक्ष स्तवनका विषय नहीं ही हैं ऐसा प्रसिद्ध है । वे देवाधिदेव व्यवहारसे लोकके अग्रमें सुस्थित हैं और निश्चयसे
निज आत्मामें ज्योंके त्यों अत्यन्त अविचलरूपसे रहते हैं ।२९४।
[श्लोकार्थ : — ] (द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भाव — ऐसे पाँच परावर्तनरूप)
स्वस्वरूपे सहजमहिम्नि लीनोऽपि व्यवहारेण स भगवान् क्षणार्धेन लोकाग्रं प्राप्नोतीति ।
(अनुष्टुभ्)
षटकापक्रमयुक्तानां भविनां लक्षणात् पृथक् ।
सिद्धानां लक्षणं यस्मादूर्ध्वगास्ते सदा शिवाः ।।२९३।।