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जीवे अनंत भवोमां परिभ्रमण कर्युं, गुणो हीणारूपे के विपरीतरूपे परिणम्या, तोपण मूळ तत्त्व एवुं ने एवुं ज छे, गुणो एवा ने एवा ज छे. ज्ञानगुण हीणारूपे परिणम्यो तेथी कांई तेना सामर्थ्यमां ऊणप आवी नथी. आनंदनो अनुभव नथी एटले कांई आनंदगुण क्यांय चाल्यो गयो नथी, हणाई गयो नथी, घसाई गयो नथी. शक्तिरूपे बधुं एम ने एम रह्युं छे. अनादि काळथी जीव बहार भमे छे, घणुं ओछुं जाणे छे, आकुळतामां रोकाई गयो छे, तोपण चैतन्यद्रव्य अने तेना ज्ञान-आनंदादि गुणो एवां ने एवां स्वयमेव सचवायेलां रह्यां छे, तेमने साचववा पडतां नथी.
— आवा परमार्थस्वरूपनी सम्यग्द्रष्टि जीवने अनुभवयुक्त प्रतीति होय छे. ३६९.
जेने आत्मानुं करवुं होय तेणे आत्मानुं ध्येय ज आगळ राखवा जेवुं छे. ‘कार्यो’नी गणतरी करवा करतां एक आत्मानुं ध्येय ज मुख्य राखवुं ते उत्तम छे. प्रवृत्तिरूप ‘कार्यो’ तो भूमिकाने योग्य थाय छे.
ज्ञानीओ आत्माने मुख्य राखी जे क्रिया थाय तेने जोया करे छे. तेमनां सर्व कार्योमां ‘आत्मा