करवुं. पोतानी चैतन्यपरिणति आत्माने ओळखे ए ज ध्येय होवुं जोईए. ते ध्येयनी सिद्धि अर्थे दरेक मुमुक्षुए आम ज करवुं जोईए एवो नियम न होय. ४२१.
वळग्यो छो. तुं खसी जा ने! विकल्पमां जरा पण सुख अने शान्ति नथी, अंदरमां पूर्ण सुख अने समाधान छे.
पहेलां आत्मस्वभावनी प्रतीति थाय, भेदज्ञान थाय, पछी विकल्प तूटे अने निर्विकल्प स्वानुभूति थाय. ४२२.
प्रश्नः — सर्वगुणांश ते सम्यक्त्व कह्युं छे, तो शुं निर्विकल्प सम्यग्दर्शन थतां आत्माना बधा गुणोनुं आंशिक शुद्ध परिणमन वेदनमां आवे?
उत्तरः — निर्विकल्प स्वानुभूतिनी दशामां आनंद- गुणनी आश्चर्यकारी पर्याय प्रगट थतां आत्माना बधा गुणोनुं (यथासंभव) आंशिक शुद्ध परिणमन प्रगट थाय छे अने बधा गुणोनी पर्यायोनुं वेदन थाय छे.