तेना मध्यभागमां आवेला मनुष्य लोकना प्रतिपादन वडे संक्षेपमां मध्यमलोकनुं व्याख्यान
समाप्त थयुं. मनुष्यलोकमां त्रणसो अठाणुं अने तिर्यक्लोकमां नन्दीश्वरद्वीप, कुंडलद्वीप अने
रुचकद्वीपमां क्रमशः बावन, चार अने चार अकृत्रिम, स्वतंत्र जिनगृहो जाणवां.
पृथ्वीतळथी सातसो नेवुं योजन उपर आकाशमां तारानां विमानो छे, तेनाथी दश योजन
उपर सूर्यनां विमानो छे, तेनाथी एंसी योजन उपर चंद्रनां विमानो छे, त्यार पछी
त्रैलोक्यसारमां कहेल क्रम प्रमाणे चार योजन उपर अश्विनी आदि नक्षत्रोनां विमान छे,
तेना पछी चार योजन उपर बुधनां विमान छे, तेना पछी त्रण योजन उपर शुक्रनां विमान
छे, पछी त्रण योजन उपर बृहस्पतिनां विमान छे, त्यार पछी त्रण योजन उपर मंगळनां
विमान छे, त्यांथी पण त्रण योजन उपर शनिश्चरनां विमान छे. ते ज कह्युं छे
मध्यमलोकव्याख्यानं समाप्तम्
स्वतन्त्रजिनगृहा ज्ञातव्याः
परमशीतियोजनानि गत्वा चन्द्रविमानाः, ततोऽपि त्रैलोक्यसारकथितक्रमेण योजनचतुष्टयं गते
अश्विन्यादिनक्षत्रविमानाः, ततः परं योजनचतुष्टयं गत्वा बुधविमानाः, ततः परं योजनत्रयं
गत्वा शुक्रविमानाः, ततः परं योजनत्रये गते बृहस्पतिविमानाः, ततो योजनत्रयानन्तरं
मंगलविमानाः, ततोऽपि योजनत्रयान्तरं शनैश्वरविमाना इति