Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 2 (Dhal 6).

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१६४ ][ छ ढाळा
काय)ना जीवोनो घात करवो ते द्रव्यहिंसा छे अने राग-द्वेष, काम,
क्रोध, मान इत्यादि भावोनी उत्पत्ति थवी ते भावहिंसा छे.
वीतरागी मुनि (साधु) आ बे प्रकारनी हिंसा करता नथी, तेथी
तेमने (१)
*अहिंसा-महाव्रत होय छे. स्थूळ के सूक्ष्म ए बन्ने
प्रकारनुं जूठुं बोलता नथी तेथी तेने (२) सत्य-महाव्रत होय छे,
अने बीजी कोई वस्तुनी तो वात ज शुं, परंतु माटी अने पाणी
पण दीधा वगर ग्रहण करता नथी तेथी तेमने (३)
अचौर्यमहाव्रत होय छे. शियळना अढार हजार भेदोनुं सदा
पालन करे छे अने चैतन्यरूप आत्मस्वरूपमां लीन रहे छे तेथी
तेने (४) ब्रह्मचर्य (आत्मस्थिरतारूप) महाव्रत होय छे. १.
परिग्रहत्याग महाव्रत, £र्यासमिति+ अने भाषासमिति
अंतर चतुर्दस भेद बाहिर, संग दसधातैं टलैं,
परमाद तजि चौकर मही लखि, समिति इर्यातैं चलैं;
जग-सुहितकर सब अहितहर, श्रुति सुखद सब संशय हरैं,
भ्रमरोग-हर जिनके वचन, मुखचन्द्रतैं अमृत झरैं. २.
अन्वयार्थ[ते वीतरागी दिगम्बर जैन मुनि] (चतुर्दस
* नोंधअहीं वाक्यो बदलवाथी अनुक्रमे महाव्रतोनुं लक्षण बने छे.
जेमके, बन्ने प्रकारनी हिंसा न करवी ते अहिंसा-महाव्रत छे ए वगेरे.
+ अदत्त वस्तुओनुं प्रमादथी ग्रहण करवुं ते ज चोरी कहेवाय छे, तेथी प्रमाद
न होवा छतां मुनिराज नदी अने झरणा वगेरेनुं प्रासुक थई गयेल पाणी,
भस्म (राख) तथा पोतानी मेळे पडी गयेलां प्रासुक सेमरना फळ अने
तुम्बीफळ वगेरेनुं ग्रहण करी शके छे एम श्लोकवर्तिकालंकारनो अभिमत
छे. पृ. ४६३.