क्रोध, मान इत्यादि भावोनी उत्पत्ति थवी ते भावहिंसा छे.
वीतरागी मुनि (साधु) आ बे प्रकारनी हिंसा करता नथी, तेथी
तेमने (१)
अने बीजी कोई वस्तुनी तो वात ज शुं, परंतु माटी अने पाणी
पण दीधा वगर ग्रहण करता नथी तेथी तेमने (३)
अचौर्यमहाव्रत होय छे. शियळना अढार हजार भेदोनुं सदा
पालन करे छे अने चैतन्यरूप आत्मस्वरूपमां लीन रहे छे तेथी
तेने (४) ब्रह्मचर्य (आत्मस्थिरतारूप) महाव्रत होय छे. १.
परमाद तजि चौकर मही लखि, समिति इर्यातैं चलैं;
जग-सुहितकर सब अहितहर, श्रुति सुखद सब संशय हरैं,
भ्रमरोग-हर जिनके वचन, मुखचन्द्रतैं अमृत झरैं. २.
भस्म (राख) तथा पोतानी मेळे पडी गयेलां प्रासुक सेमरना फळ अने
तुम्बीफळ वगेरेनुं ग्रहण करी शके छे एम श्लोकवर्तिकालंकारनो अभिमत
छे. पृ. ४६३.