कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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टीका — भवति । कोऽसौ, जनो लोकः । किंविशिष्टः, कोपि निर्विवेको, न सर्वः ।
किंविशिष्टो भवति, स्वस्थंमन्यः स्वस्थमात्मानं मन्यमानो अहं सुखीति मन्यत इत्यर्थः । केन
कृत्वा, धनादिना द्रव्यकामिन्यादीष्टवस्तुजातेन । किंविशिष्टेन, दुरर्ज्येन — अपायबहुलत्वाद्
दुर्ध्यानावेशाच्च दुःखेन महता कष्टेनार्जित इति दुरर्ज्येन – तथा असुरक्ष्येण दुस्त्राणेन
यन्ततोरक्ष्यमाणस्याप्यपायस्यावश्यंभावित्वात् । तथा नश्वरेण रक्ष्यमाणस्यापि विनाशसंभवाद-
अर्थ — जैसे कोई ज्वरवाला प्राणी घीको खाकर या चिपड़ कर अपनेको स्वस्थ
मानने लग जाय, उसी प्रकार कोई एक मनुष्य मुश्किलसे पैदा किये गये तथा जिसकी
रक्षा करना कठिन है और फि र भी नष्ट हो जानेवाले हैं, ऐसे धन आदिकोंसे अपनेको
सुखी मानने लग जाता है ।
विशदार्थ — जैसे कोई एक भोला प्राणी जो सामज्वर (ठंड देकर आनेवाले
बुखार)से पीड़ित होता है, वह बुद्धिके ठिकाने न रहनेसे – बुद्धिके बिगड़ जानेसे घी को
खाकर या उसकी मालिश कर लेनेसे अपने आपको स्वस्थ-नीरोग मानने लगता है, उसी
तरह कोई कोई (सभी नहीं) धन, दौलत, स्त्री आदिक जिनका कि उपार्जित करना कठिन
अन्वयार्थ : — जेम [ज्वरवान् ] कोई ज्वरग्रस्त (तावथी पीडातो) माणस [सर्पिषा ]
घीथी (एटले घी पीने वा शरीरे चोपडीने) [स्वस्थंमन्यः भवति ] पोताने स्वस्थ (नीरोगी)
माने छे, [इव ] तेम [कः अपि जनः ] कोई एक मनुष्य [दुरर्ज्यन ] मुश्केलीथी (कष्टथी) पेदा
करेला (कमायेला) [असुरक्ष्येण ] जेनी सारी रीते सुरक्षा करवी अशक्य छे एवा [नश्वरेण ]
नश्वर (नाशवान) [धनादिना ] धन आदिथी [स्वस्थंमन्यः भवति ] पोताने सुखी माने छे.
टीका : — थाय छे. कोण ते? माणस – लोक. केवो (माणस)? कोई एक विवेकहीन,
(किन्तु) बधा नहि, केवो थाय छे? पोताने स्वस्थ (नीरोग) माने छे; हुं सुखी छुं एम
माने छे — एवो अर्थ छे. शा वडे करीने? धनादि वडे अर्थात् द्रव्य, स्त्री आदि इष्ट
वस्तुओना समुदाय वडे. केवा (धनादि) वडे? दुःखथी अर्जित एटले बहु कष्टपणाना कारणे
तथा दुर्ध्यानना आवेशथी कष्टथी – महाक्लेशथी उपार्जित (कमायेल) तथा यत्नथी रक्षवा छतां
अवश्यंभावी नाशने लीधे मुश्केलीए रक्षित तथा नश्वर अर्थात् रक्षा पामेला धननो पण
विनाश संभवित होवाथी अशाश्वत – एवा (धनादि वडे).
आ विषयमां द्रष्टान्त आपे छे — ‘ज्वरेत्यादि०’ —
[अहीं ‘इव’ शब्द ‘यथा’ना अर्थमां छे.]