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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
शाश्वतेन । अत्र दृष्टान्तमाह । ज्वरेत्यादि इव शब्दो यथार्थे यथा कोऽपि मुग्धो ज्वरवान् अतिशये
मतेर्विनाशात् सामज्वरार्त सर्पिषा घृतेन पानाद्युपयुक्तेन स्वस्थंमन्यो भवति । निरामयमात्मानं
मन्यते ततो बुद्धयस्व दुरुपार्ज्यदुरक्षणभङ्गुरद्रव्यादिना दुःखमेव स्यात् ।
उक्तं च —
‘‘अर्थस्योपार्जने दुःखमर्जितस्य च रक्षणे ।
आये दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थं दुःखभाजनम् ।।’’
तथा जो रक्षा करते भी नष्ट हो जानेवाले हैं — ऐसे इष्ट वस्तुओंमें अपने आपको ‘मैं सुखी
हूँ’ ऐसा मानने लग जाते हैं, इसलिए समझो कि जो मुश्किलोंसे पैदा किये जाते तथा
जिनकी रक्षी बड़ी कठिनाईसे होती है, तथा जो नष्ट हो जाते, स्थिर नहीं रहते ऐसे
धनादिकोंसे दुःख ही होता है, जैसा कि कहा है — ‘‘अर्थस्योपार्जने दुःखं
०’’
‘धनके कमानेमें दुःख, उसकी रक्षा करनेमें दुःख, उसके जानेमें दुःख, इस तरह
हर हालतमें दुःखके कारणरूप धनको धिक्कार हो’ ।
जेम कोई एक मूर्ख ज्वरपीडित मनुष्य अर्थात् सामज्वरपीडित (टाढिया ताववाळो)
मनुष्य, बुद्धिना अतिशय बगाडथी, पानादिमां (पीवा वगेरेमां) उपयुक्त (उपयोगमां
लीधेला) घी वडे पोताने स्वस्थ (नीरोगी) माने छे अर्थात् पोतानी जातने रोगरहित माने
छे, तेम मुश्केलीथी उपार्जित, कष्टथी रक्षित अने क्षणभंगुर [क्षणमां नाश पामता] — एवा
द्रव्यादि वडे दुःख ज होई शके – एम तुं समज. कह्युं छे के —
धनना उपार्जनमां दुःख, उपार्जित धननी रक्षा करवामां दुःख, ते आवे तोय दुःख
अने जाय तोय दुःख; माटे दुःखना भाजनरूप (कारणरूप) ते धनने धिक्कार हो.
भावार्थ : — जेम सामज्वरथी पीडित कोई एक मूर्ख जन घीना उपयोग वडे पोताने
स्वस्थ (नीरोगी) माने छे, तेम कोई एक माणस महा मुश्केलीथी अने दुःखथी उपार्जित
तथा रक्षित एवा क्षणभंगुर धनादि वडे पोताने सुखी माने छे.
सामज्वरमां घीनो उपयोग करवाथी ताव मटवाने बदले वधे छे, तेम धनादिनी
ममताथी सुखने बदले दुःख वधे छे, कारण के तेने उपार्जन करवामां दुःख, तेने साचववामां
दुःख अने तेनो नाश थतां (वियोग थतां) पण दुःख थाय छे. एम दरेक हालतमां धन
दुःखनुं ज निमित्तकारण छे. माटे लक्ष्मीवान लोको धनादिथी सुखी छे, एम मानवुं ते
भ्रममूलक छे. १३