कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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‘भूयोऽपि विनेयः पृच्छति ।’ ‘एवंविधां संपदां कथं न त्यजतीति ।’ अनेन
दुरर्जत्वादिप्रकारेण लोकद्वयेऽपि दुःखदां धनादिसंपत्तिं कथं न मुञ्चति जनः । कथमिति
विस्मयगर्भे प्रश्ने ।
अत्र गुरुरुत्तरमाह; —
“विपत्तिमात्मनो मूढः परेषामिव नेक्षते ।
दह्यमानमृगाकीर्णवनान्तरतरुस्थवत् ।।१४।।
शंका — फि र भी शिष्य पूछता है कि बड़े आश्चर्यकी बात है, कि जब ‘मुश्किलोंसे
कमाई जाती’ आदि हेतुओंसे धनादिक सम्पत्ति दोनों लोकोंमें दुःख देनेवाली है, तब ऐसी
सम्पत्तिको लोग छोड़ क्यों नहीं देते ? आचार्य उत्तर देते हैं —
परकी विपदा देखता, अपनी देखे नाहिं ।
जलते पशु जा वन विषैं, जड़ तरुपर ठहराहिं ।।१४।।
अर्थ — जिसमें अनेकों हिरण दावानलकी ज्वालासे जल रहे हैं, ऐसे जंगलके मध्यमें
फरीथी शिष्य पूछे छे – आश्चर्य छे के आवा प्रकारनी संपदाने (लोको) केम छोडता
नथी? अर्थात् दुःखथी उपार्जित – वगेरे कारणोथी बंने लोकमां (आ लोकमां अने परलोकमां)
पण दुःखदायक — एवी धनादिसंपत्तिने लोक केम छोडता नथी? [‘कथम्’ शब्द
विस्मयगर्भित प्रश्न सूचवे छे.]
आचार्य तेनो उत्तर आपे छे —
देखे विपत्ति अन्यनी, निजनी देखे नाहि,
बळतां पशुओ वन विषे, देखे तरु पर जाई. १४.
अन्वयार्थ : — [दह्यमानमृगाकीर्णवनान्तरतरुस्थवत् ] (दावानलनी ज्वालाथी) बळी
रहेला मृगोथी छवायेला वननी मध्यमां वृक्ष उपर बेठेला मनुष्यनी जेम [मूढः ] (संसारी)
मूढ प्राणी [परेषाम् इव ] बीजाओनी (विपत्तिनी) जेम [आत्मनः विपत्तिं ] पोतानी विपत्तिने
[न ईक्षते ] जोतो नथी.
*परस्येव न जानाति विपत्तिं स्वस्य मूढधीः ।
वने सत्वसमाकीर्णे दह्यमाने तरुस्थवत् ।।
(ज्ञानावर्णवे – श्रीशुभचन्द्रः )