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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
टीका — नेक्षते न पश्यति कोऽसौ ? मूढो धनाद्यासक्त्या लुप्तविवेको लोकः । कां ?
विपत्तिं चौरादिना क्रियमाणां धनापहाराद्यापदां । कस्य ? आत्मनः स्वस्य । केषामिव, परेषामिव
यथा इमे विपदा आक्रम्यन्ते तथाहमप्याक्रन्तव्य इति न विवेचयतीत्यर्थः । क इव ? प्रदह्यमानैः
दावानलज्वालादिभिर्भस्मीक्रियमाणैर्मृगैर्हरिणादिभिराकीर्णस्य संकुलस्य वनस्यांतरे मध्ये वर्तमानं तरुं
वृक्षमारूढो जनो यथा आत्मनो मृगाणामिव विपत्तिं न पश्यति ।
वृक्ष पर बैठे हुए मनुष्यकी तरह यह संसारी प्राणी दूसरोंकी तरह अपने ऊपर आनेवाली
विपत्तियोंका ख्याल नहीं करता है ।
विशदार्थ — धनादिकमें आसक्ति होनेके कारण जिसका विवेक नष्ट हो गया है,
ऐसा यह मूढ़ प्राणी चोरादिकके द्वारा की जानेवाली, धनादिक चुराये जाने आदिरूप अपनी
आपत्तिको नहीं देखता है, अर्थात् वह यह नहीं ख्याल करता कि जैसे दूसरे लोग
विपत्तियोंके शिकार होते हैं, उसी तरह मैं भी विपत्तियोंका शिकार बन सकता हूँ । इस
वनमें लगी हुई यह आग इस वृक्षको और मुझे भी जला देगी । जैसे ज्वालानलकी
ज्वालाओंसे जहाँ अनेक मृगगण झुलस रहे हैं – जल रहे हैं, उसी वनके मध्यमें मौजूद वृक्षके
ऊपर चढ़ा हुआ आदमी यह जानता है कि ये तमाम मृगगण ही घबरा रहे हैं – छटपटा
रहे हैं, एवं मरते जा रहे हैं, इन विपत्तियोंका मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं है, मैं तो सुरक्षित
हूँ । विपत्तियोंका सम्बन्ध दूसरोंकी सम्पत्तियोंसे है, मेरी सम्पत्तियोंसे नहीं है ।।१४।।
टीका : — देखतो नथी – जोतो नथी. कोण ते? मूढ अर्थात् धनादिनी आसक्तिथी
विवेकहीन बनेलो लोक. कोने (देखतो नथी)? विपत्तिने – अर्थात् चोर वगेरेथी करवामां
आवती धन – अपहरण आदिरूप आपदाने. कोनी? आत्मानी – पोतानी. कोनी माफक?
बीजाओनी माफक. जेम आ (मृगो) आपदाथी (संकटथी) घेराई गयां छे, तेम हुं पण
(विपत्तिथी) घेराई जईश (विपत्तिनो भोग बनीश) एम ते ख्याल करतो नथी – एवो अर्थ
छे. कोनी माफक? बळी जता – दावानलनी ज्वाळाओथी भस्मीभूत बनता — मृगोथी –
हरिणादिथी भरेला वननी मध्यमां आवेला वृक्ष उपर बेठेला मनुष्यनी माफक; ते (मनुष्य)
मृगोनी विपत्तिनी जेम पोतानी विपत्तिने देखतो नथी.
भावार्थ : — मृग आदि अनेक प्राणीओथी भरेला वनमां आग लागतां, तेनाथी
बचवा माटे कोई माणस वननी मध्यमां आवेला वृक्ष उपर चढीने बेसे छे अने अग्निनी
ज्वाळाओथी भस्मीभूत बनतां प्राणीओने नीहाळे छे. ते वखते एम धारे छे के, ‘हुं तो
वृक्ष उपर सहीसलामत छुं.’ अग्नि मने नुकशान करशे नहि; परंतु ते अज्ञानीने खबर
नथी के अग्नि थोडी वारमां वृक्षने अने तेने पण भरखी जशे. ए प्रमाणे मूढ जीव,