कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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पुनराह शिष्यः कुत एतदिति, भगवन् ! कस्माद्धेतोरिदं सन्निहिताया अपि विपदो अदर्शनं
जनस्य ।
गुरुराह — लोभादिति, वत्स ! धनादिगार्ध्यात्पुरोवर्तिनीमप्यापदं धनिनो न पश्यन्ति ।
यतः —
आयुर्वृद्धिक्षयोत्कर्षहेतुं कालस्य निर्गम् ।
वाञ्छतां धनिनामिष्टं जीवितात्सुतरां धनम् ।।१५।।
फि र भी शिष्यका कहना है कि, भगवन् ! क्या कारण है कि लोगोंको निकट आई
हुई भी विपत्तियाँ दिखाई नहीं देती ? आचार्य जवाब देते हैं — ‘‘लोभात्’’ लोभके कारण,
हे वत्स ! धनादिककी गृद्धता-आसक्तिसे धनी लोग सामने आई हुई भी विपत्तिको नहीं
देखते हैं, कारण कि —
आयु क्षय धनवृद्धि को, कारण काल प्रमान ।
चाहत हैं धनवान धन, प्राणनिते अधिकान ।।१५।।
अर्थ — कालका व्यतीत होना, आयुके क्षयका कारण है और कालान्तरके माफि क
ब्याजके बढ़नेका कारण है, ऐसे कालके व्यतीत होनेको जो चाहते हैं, उन्हें समझना चाहिए
कि अपने जीवनसे धन ज्यादा इष्ट है ।
धनादिकना कारणे बीजाओ उपर आवती आपत्तिओने देखवा छतां पोताने सहीसलामत
माने छे अने कदी विचार पण करतो नथी, के तेवी विपत्तिओ मोडी – वहेली तेना उपर
पण आवी पडशे अने कालाग्नि तेने पण भरखी जशे. १४.
फरी शिष्य कहे छे — एम केम? भगवन्! कया कारणथी नजीक आवेली
आपदाओने पण माणस देखतो नथी?
गुरु कहे छे — ‘लोभना कारणे’, हे वत्स! धनादिनी गृद्धि एटले आसक्तिथी
धनिको, सामे (आगळ) उपस्थित (आवी पडेली) आपदाने पण देखता नथी, कारण के —
आयु – क्षय धनवृद्धिनुं, कारण काळ ज जाण,
प्राणोथी पण लक्ष्मीने, इच्छे धनी अधिकान. १५.
अन्वयार्थ : — [कालस्य निर्गमं ] कालनुं निर्गमन (व्यतीत थवुं) ते [आयुर्वृद्धि-
क्षयोत्कर्षहेतुं ] आयुना क्षयनुं तथा (कालनी) वृद्धि, उत्कर्षनुं (व्याज वृद्धिनुं) (कारण छे)