Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 15.

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ४५
पुनराह शिष्यः कुत एतदिति, भगवन् ! कस्माद्धेतोरिदं सन्निहिताया अपि विपदो अदर्शनं
जनस्य
गुरुराहलोभादिति, वत्स ! धनादिगार्ध्यात्पुरोवर्तिनीमप्यापदं धनिनो न पश्यन्ति
यतः
आयुर्वृद्धिक्षयोत्कर्षहेतुं कालस्य निर्गम्
वाञ्छतां धनिनामिष्टं जीवितात्सुतरां धनम् ।।१५।।
फि र भी शिष्यका कहना है कि, भगवन् ! क्या कारण है कि लोगोंको निकट आई
हुई भी विपत्तियाँ दिखाई नहीं देती ? आचार्य जवाब देते हैं‘‘लोभात्’’ लोभके कारण,
हे वत्स ! धनादिककी गृद्धता-आसक्तिसे धनी लोग सामने आई हुई भी विपत्तिको नहीं
देखते हैं, कारण कि
आयु क्षय धनवृद्धि को, कारण काल प्रमान
चाहत हैं धनवान धन, प्राणनिते अधिकान ।।१५।।
अर्थकालका व्यतीत होना, आयुके क्षयका कारण है और कालान्तरके माफि क
ब्याजके बढ़नेका कारण है, ऐसे कालके व्यतीत होनेको जो चाहते हैं, उन्हें समझना चाहिए
कि अपने जीवनसे धन ज्यादा इष्ट है
धनादिकना कारणे बीजाओ उपर आवती आपत्तिओने देखवा छतां पोताने सहीसलामत
माने छे अने कदी विचार पण करतो नथी
, के तेवी विपत्तिओ मोडीवहेली तेना उपर
पण आवी पडशे अने कालाग्नि तेने पण भरखी जशे. १४.
फरी शिष्य कहे छेएम केम? भगवन्! कया कारणथी नजीक आवेली
आपदाओने पण माणस देखतो नथी?
गुरु कहे छे‘लोभना कारणे’, हे वत्स! धनादिनी गृद्धि एटले आसक्तिथी
धनिको, सामे (आगळ) उपस्थित (आवी पडेली) आपदाने पण देखता नथी, कारण के
आयुक्षय धनवृद्धिनुं, कारण काळ ज जाण,
प्राणोथी पण लक्ष्मीने, इच्छे धनी अधिकान. १५.
अन्वयार्थ :[कालस्य निर्गमं ] कालनुं निर्गमन (व्यतीत थवुं) ते [आयुर्वृद्धि-
क्षयोत्कर्षहेतुं ] आयुना क्षयनुं तथा (कालनी) वृद्धि, उत्कर्षनुं (व्याज वृद्धिनुं) (कारण छे)