कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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अत्राह शिष्यः । ‘कथं धनं निन्द्यं ? येन पुण्यमुपार्ज्यते इति’ पात्रदानदेवार्चनादिक्रियायाः
पुण्यहेतोर्धनं विना असंभवात् पुण्यसाधनं धनं कथं निन्द्यं ? किं तर्हि प्रशस्यमेवातो यथा
कथंचिद्धनमुपार्ज्य पात्रादौ च नियोज्य सुखाय पुण्यमुपार्ज नीयमिति ।
अत्राह —
त्यागाय श्रेयसे वित्तमवित्तः संचिनोति यः ।
स्वशरीरं स पङ्केन स्नास्यामीति विलम्पति ।।१६।।
यहाँ पर शिष्यका कहना है कि धन जिससे पुण्यका उपार्जन किया जाता है, वह
निंद्य-निंदाके योग्य क्यों है ? पात्रोंको दान देना, देवकी पूजा करना, आदि क्रियाएँ पुण्यकी
कारण हैं, वे सब धनके बिना हो नहीं सकती । इसलिए पुण्यका साधनरूप धन निंद्य क्यों ?
वह तो प्रशंसनीय ही है । इसलिए जैसे बने वैसे धनको कमाकर पात्रादिकोंमें देकर सुखके
लिए पुण्य संचय करना चाहिए । इस विषयमें आचार्य कहते हैं —
पुण्य हेतु दानादिको, निर्धन धन संचेय ।
स्नान हेतु निज तन कुधी, कीचड़से लिम्पेय ।।१६।।
अर्थ — जो निर्धन, पुण्यप्राप्ति होगी इसलिए दान करनेके लिए धन कमाता या
जोड़ता है, वह ‘स्नान कर लूँगा’ ऐसे ख्यालसे अपने शरीरको कीचड़से लपेटता है ।
जीवन – (आयु)ना विनाश तरफ लक्ष आपता नथी. आम व्यामोहनुं कारण होवाथी धन
धिक्कारने पात्र छे. १५.
अहीं, शिष्य कहे छे – जेनाथी पुण्यनुं उपार्जन थाय छे ते धन निन्द्य (निन्दाने
योग्य), केम? पुण्यना हेतुरूप पात्र दान, देवार्चनादि क्रियाओ धन विना असंभवित छे.
तो पुण्यना साधनरूप धन केवी रीते निंदवा योग्य छे? ते तो प्रशस्य (स्तुतिपात्र) ज छे.
माटे कोई रीते धनोपार्जन करी (धन कमाईने) पात्रादिमां वापरी सुख माटे पुण्य – उपार्जन
करवुं जोईए.
अहीं, आचार्य कहे छे —
दान – हेतु उद्यम करे, निर्धन धन संचेय,
देहे कादव लेपीने, माने ‘स्नान करेय’. १६.
अन्वयार्थ : — [यः ] जे [अवित्तः ] निर्धन [श्रेयसे ] पुण्यनी प्राप्ति अर्थे [त्यागाय ]