कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ४९
तथा पापेन धनमुपार्ज्य पात्रदानादिपुण्येन क्षपयिष्यामीति धनार्जने प्रवर्तमानोऽपि । न च
शुद्धवृत्त्या कस्यापि धनार्जनं संभवति ।
तथा चोक्तम् [आत्मानुशासने ] —
‘‘शुद्धैर्धनैर्विवर्धन्ते सतामपि न संपदः ।
नहि स्वच्छाम्बुभिः पूर्णाः कदाचिदपि सिंधवः ।।’’
लगा हुआ व्यक्ति भी समझना चाहिए । संस्कृतटीकामें यह भी लिखा हुआ है कि, चक्रवर्ती
आदिकोंकी तरह जिसको बिना यत्न किये हुए धनकी प्राप्ति हो जाय, तो वह उस धनसे
कल्याणके लिये पात्रदानादिक करे तो करे ।
फि र किसीको भी धनका उपार्जन, शुद्ध वृत्तिसे हो भी नहीं सकता, जैसा कि
श्रीगुणभद्राचार्यने आत्मानुशासनमें कहा है — ‘‘शुद्धैर्धनैर्विवर्धन्ते०’’
अर्थ — ‘‘सत्पुरुषोंकी सम्पत्तियाँ, शुद्ध ही शुद्ध धनसे बढ़ती हैं, यह बात नहीं है ।
देखो, नदियाँ स्वच्छ जलसेही परिपूर्ण नहीं हुआ करती हैं । वर्षामें गँदे पानीसे भी भरी
रहती हैं’’ ।।१६।।
धनोपार्जित करी पात्रदानादिना पुण्यथी तेनो (पापनो) नाश करीश, एम समजी धन
कमावानी प्रवृत्ति करनार मनुष्य पण तेवो छे (अविचारी छे). कोईने पण शुद्ध वृत्तिथी
(दानतथी) धनोपार्जन संभवतुं नथी.
वळी, ‘आत्मानुशासन’मां कह्युं छे के —
सत्पुरुषोनी सम्पत्ति शुद्ध धनथी (न्यायोपार्जित धनथी) वधती नथी. नदीओमां कदी
पण स्वच्छ पाणीनुं पूर आवतुं नथी. (अर्थात् ते वर्षाॠतुमां मेला पाणीथी ज भरपूर
रहे छे) (जेम वर्षाॠतुमां नदीओमां मेला पाणीनुं पूर आवे छे, तेम अन्यायथी उपार्जित
धनथी धनमां घणो वधारो थाय छे).
भावार्थ : — ‘पूजा – पात्रदानादिमां धन खर्च करवाथी नवीन पुण्यथी प्राप्ति थशे
अने पूर्वोपार्जित पापनो क्षय थशे’ — एम समजी धनहीन माणस दान माटे नोकरी, खेती
आदि कार्य करी धन कमाय छे. (धन कमावानो भाव स्वयं पापभाव छे.) ते माणस, ‘स्नान
करी लईश’ एम समजी पोताना शरीर उपर कादव चोपडनार मूर्ख माणस जेवो छे.
जेम कोई माणस पोताना निर्मळ शरीर उपर कादव चोपडी पछी स्नान करे तो
ते मूर्ख गणाय छे, तेम कोई माणस धन कमाई ते धन दानादिमां खर्च करे तो ते माणस