Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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५० ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
पुनराह शिष्यः ‘भोगोपभोगायेति ’ भगवन् ! यद्येवं धनार्जनस्य पापप्रायतया
दुःखहेतुत्वात् धनं निन्द्यं, तर्हि धनं विना सुखहेतोर्भोगोपभोगस्यासंभवात्तदर्थं स्यादिति प्रशस्यं
भविष्यति
भोगो भोजनताम्बूलादिः उपभोगो वस्तु कामिन्यादिः भोगोश्चोपभोगाश्च
भोगोपभोगं तस्मै अत्राह गुरुः तदपि नेति न केवलं पुण्यहेतुतया धनं प्रशस्यमिति यत्त्वयोक्तं
तदुक्तरीत्या न स्यात् किं तर्हि ? भोगोपभोगार्थं धनं तत्साधनं प्रशस्यमिति यत्त्वया संप्रत्युच्यते
तदपि न स्यात् कुत इति चेत्, यतः
उत्थानिकाफि र शिष्य कहता है कि भगवन् ! धनके कमानेमें यदि ज्यादातर पाप
होता है, और दुःखका कारण होनेसे धन निंद्य है, तो धनके बिना भोग और उपभोग भी
नहीं हो सकते, इसलिए उनके लिए धन होना ही चाहिए, और इस तरह धन प्रशंसनीय
माना जाना चाहिए
इस विषयमें आचार्य कहते हैं कि ‘यह बात भी नहीं है’ अर्थात् ‘पुण्यका
कारण होनेसे धन प्रशंसनीय है,’ यह जो तुमने कहा था, सो वैसा ख्याल कर धन कमाना
उचित नहीं, यह पहिले ही बताया जा चुका है
‘भोग और उपभोगके लिए धन साधन है,’
यह जो तुम कह रहे हो, सो भी बात नहीं है, यदि कहो क्यों ? तो उसके लिये कहते हैं :
पण तेना जेवो ज मूर्ख छे, कारण के ते एम समजे छे के धनोपार्जनमां जे पाप थशे ते
दानादिथी उपार्जित पुण्यथी नाश पामशे, पण आ एनो भ्रम छे.
जेम वर्षाॠतुमां नदीओ मेला पाणीथी ज उभराय छे, तेम पापभावी धननुं उपार्जन
थाय छे. माटे धनोपार्जन करवानो पापभाव करवो अने पछी ते धनने पुण्योपार्जन माटे
पूजा
पात्रदानादि शुभकार्यमां ‘हुं ते खर्चीश’ एवो अज्ञानभाव करवो मूढता छे. १६.
शिष्य फरीथी कहे छे‘भोग अने उपभोगने माटे’ हे भगवन्! जो ए रीते
धनोपार्जनमां प्रायः पाप होय, धन दुःखनुं कारण होय अने तेथी ते निंद्य होय, तो धन
विना सुखना कारणरूप भोग
उपभोग असंभवित बने; तेथी ते (भोगउपभोग) माटे
धन होय तो ते प्रशंसनीय छे.
भोजन, ताम्बुल आदि ते भोग छे अने वस्तु, स्त्री आदि उपभोग छे. भोग
अने उपभोगते भोगोपभोगते माटे (धन होवुं योग्य छे, एम शिष्यनी दलील छे).
अहीं, आचार्य कहे छेते वात पण नथी. ‘पुण्यना कारणे धन प्रशंसनीय छेएम
जे तें कह्युं ते रीते (प्रशंसनीय) होई शके नहि. वळी भोगउपभोग माटे तेनुं (धननुं)
साधन प्रशंसनीय छे, एम जे तें हमणां कह्युं ते पण केम बनी शके? जो तुं कहे, ‘केम?’
तो कारण ए छे केः