कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ५३
तर्हि यथेष्टं भुक्त्वा तृप्तेषु तेषु तृष्णासंतापः शाम्यतीति सेव्यास्ते इत्याह । अन्ते
सुदुस्त्यजान् भुक्तिप्रान्ते त्यक्तुमशक्यान् । सुभुक्तेष्वपि तेषु मनोव्यतिषङ्गस्य दुर्निवारत्वात् ।
उक्तं च — (श्री चन्द्रप्रभकाव्ये)
‘‘दहनस्तृणकाष्ठसंचयैरपि तृप्येदुदधिर्नदीशतैः ।
न तु कामसुखैः पुमानहो बलवत्ता खलु कापि कर्मणः ।।
अपि च — किमपींदं विषयमयं विषमतिविषमं पुमानयं येन ।
प्रसभमनुभूय मनो भवे भवे नैव चेतयते ।।’’
पर अन्तमें छोड़े नहीं जा सकते, अर्थात् उनके खूब भोग लेने पर भी मनकी आसक्ति
नहीं हटती,’’ जैसा कि कहा भी है — ‘‘दहनस्तृणकाष्ठसंचयैरपि०’’
‘‘यद्यपि अग्नि, घास, लकड़ी आदिके ढेरसे तृप्त हो जाय । समुद्र, सैकड़ों नदियोंसे
तृप्त हो जाय, परंतु वह पुरुष इच्छित सुखोंसे कभी भी तृप्त नहीं होता । अहो ! कर्मोंकी
कोई ऐसी ही सामर्थ्य या जबर्दस्ती है ।’’ और भी कहा है : — ‘‘किमपीदं विषयमयं०’’
‘‘अहो ! यह विषयमयी विष कैसा गजबका विष है, कि जिसे जबर्दस्ती खाकर यह
मनुष्य, भव भवमें नहीं चेत पाता है ।’’
(आचार्य) कहे छे – अंते ते छोडवा मुश्केल छे अर्थात् भोगव्या पछी तेओ छोडवा
अशक्य छे, कारण के तेमने सारी रीते भोगववा छतां, मननी आसक्ति निवारवी मुश्केल
छे. कह्युं छे के — ‘दहन....’.
जोके अग्नि, घास, लाकडां आदिना ढगलाथी तृप्त थई जाय अने समुद्र, सेंकडो
नदीओथी तृप्त थई जाय, परंतु पुरुष इच्छित सुखोथी तृप्त थतो नथी. अहो? कर्मनी
एवी कोई (विचित्र) बळजबराई (बलवानपणुं) छे!’
वळी, कह्युं छे के — ‘किमपीदं......’
‘अहो! आ विषयमयी विष केवुं अति विषम (भयंकर) छे, के जेथी आ पुरुष
तेनो भव भवमां अत्यंत अनुभव करवा छतां (विषय सुखना अनुभवथी उत्पन्न थतां
दुःखोने अनुभववा छतां) तेनुं मन चेततुं ज नथी’
शिष्य पूछे छे — तत्त्वज्ञानीओए पण भोगो न भोगव्या होय, एम सांभळवामां
आव्युं नथी (अर्थात् तत्त्वज्ञानीओ पण भोगो भोगवे छे ए जाणीतुं छे); तो ‘कोण