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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
इस तरह आरम्भ, मध्य और अन्तमें क्लेश-तृष्णा एवं आसक्तिके कारणभूत इन
भोगोपभोगोंको कौन बुद्धिमान् इन्द्रियरूपी नलियोंसे अनुभवन करेगा ? कोई भी नहीं ।
यहाँ पर शिष्य शंका करता है कि तत्त्वज्ञानियोंने भोगोंको न भोगा हो यह बात
सुननेमें नहीं आती है । अर्थात् बड़े बड़े तत्त्वज्ञानियोंने भी भोगोंको भोगा है, यही प्रसिद्ध
है । तब ‘भोगोंको कौन बुद्धिमान-तत्त्वज्ञानी सेवन करेगा ?’ यह उपदेश कैसे मान्य किया
जाय ? इस बात पर कैसे श्रद्धान किया जाय ? आचार्य जवाब देते हैं — कि हमने उपर्युक्त
कथनके साथ ‘‘कामं अत्यर्थं०’’ आसक्तिके साथ रुचिपूर्वक यह भी विशेषण लगाया है ।
तात्पर्य यह है, कि चारित्रमोहके उदयसे भोगोंको छोड़नेके लिये असमर्थ होते हुए भी
तत्त्वज्ञानी पुरुष भोगोंको त्याज्य-छोड़ने योग्य समझते हुए ही सेवन करते हैं । और जिसका
मोहोदय मंद पड़ गया है, वह ज्ञान-वैराग्यकी भावनासे इन्द्रियोंको रोककर, इन्द्रियोंको
वशमें कर, शीघ्र ही अपने (आत्म) कार्य करनेके लिये कटिबद्ध-तैयार हो जाता है —
जैसा कि कहा गया है — ‘इदं फलमियं क्रिया०’’
बुद्धिमान भोगोने सेवशे (भोगवशे’ — एवा उपदेशमां केवी रीते श्रद्धा कराय? (अर्थात्
एवो उपदेश केवी रीते मनाय?......)
आचार्य कहे छे — (ज्ञानी) ‘कामम्’ एटले अतिशयपणे (आसक्तिपूर्वक – रुचिपूर्वक
ते सेवतो नथी) अहीं तात्पर्य ए छे के —
चारित्रमोहना उदयथी भोगोने छोडवा असमर्थ होवा छतां, तत्त्वज्ञानी भोगोने
हेयरूपे समजीने (एटले तेओ छोडवा योग्य छे एम समजीने) सेवे छे. जेनो मोहनो
उदय मंद पडी गयो छे, तेवो ते (ज्ञानी) ज्ञान अने वैराग्यनी भावनाथी इन्द्रिय – समूहने
वश करी (इन्द्रियो तरफना वलणने संयमित करी) एकाएक (शीघ्र) आत्मकार्य माटे
उत्साहित थाय छे; तथा कह्युं छे के — ‘इदंफलमियं......’
‘आ फल छे, आ क्रिया छे, आ करण छे, आ क्रम छे, आ व्यय (हानि – खर्च)
छे, आ आनुषंगिक (भोगोने अनुसरतुं) फल छे, आ मारी दशा छे, आ मित्र छे, आ
शत्रु छे, आ देश छे, आ काल छे — ए सर्व वातो उपर पूरो ख्याल राखी बुद्धिमान्
पुरुष प्रयत्न करे छे, परंतु बीजो (कोई मूर्ख) तेम करतो नथी.’
आचार्य फरीथी कहे छे — ‘यदर्थमेतदेवंविधमिति’.
भावार्थ : — आदि, मध्य अने अंतमां भोगोपभोग क्लेश, तृष्णा अने आसक्तिना
कारणभूत छे. भोग्य वस्तुओने प्राप्त करवामां कृषि, नोकरी आदि कारणोथी आरंभमां