कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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ननु तत्त्वविदोपि भोगानभुक्तवन्तो न श्रूयन्त इति कामान् कः सेवते सुधीरित्युपदेशः
कथं श्रद्धयत इत्याह । काममिति । अत्यर्थं । इदमत्र तात्पर्यं चारित्रमोहोदयात् भोगान्
त्यक्तुमशक्नुवन्नपि तत्त्वज्ञो हेयरूपतया कामान्पश्यन्नेव सेवते । मन्दीभवन्मोहोदयस्तु
ज्ञानवैराग्यभावनया करणग्रामं संयम्य सहसा स्वकार्यायोत्सहंत एव ।
‘‘यह फल है, यह क्रिया है, यह करण है, यह क्रम-सिलसिला है, यह खर्च है,
यह आनुषंगिक (ऊपरी) फल है, यह मेरी अवस्था है, यह मित्र है, यह शत्रु है, यह
देश है, यह काल है, इन सब बातों पर ख्याल देते हुए बुद्धिमान् पुरुष प्रयत्न किया
करता है । मूर्ख ऐसा नहीं करता ।’’ ।।१७।।
शरीर, इन्द्रियो अने मन संबंधी क्लेश थाय छे – अत्यंत कष्ट पडे छे. ज्यारे भोग्य वस्तुओ
मुश्केलीथी प्राप्त थाय छे, त्यारे तेने भोगववा छतां तृप्ति थती नथी, फरी फरी ते
भोगववानी इच्छा थाय छे अने तेथी चित्त व्याकुल रहे छे. अतृप्तिवश तेने (भोगोने)
छोडवानो भाव थतो नथी.
जेम अग्निमां गमे तेटलां काष्ठ – तृण नाखो, तोपण ते तृप्त थती नथी अने समुद्र
सेंकडो नदीओनां पाणीथी पण तृप्त थतो नथी, तेम मनुष्यनी तृष्णा अनेक भोगोथी पण
कदी तृप्त थती नथी, किन्तु वधती जाय छे.
क्लेशजनक, अतृप्तिकारक अने आसक्तिने लीधे छोडवा मुश्केल – एवा भोगोने कोण
बुद्धिमान् पुरुष सेवशे? अर्थात् कोई बुद्धिमान् सेवशे नहि.
अहीं शिष्यनो प्रश्न छे, के जो भोगो भोगववानो भाव अहितकर होय अने
ते सेववा योग्य नथी – एवो जो तमारो उपदेश होय तो भरत जेवा ज्ञानी पुरुषोने पण
भोगो भोगवता सांभळवामां आव्या छे. तो आ वात आपना उपदेश साथे असंगत ठरे
छे ( – बंध बेसती नथी). तेनुं केम?
आचार्य समाधान करे छे के – जोके ज्ञानी पुरुषो चारित्रमोहनीय कर्मना उदयवश
भोगोने भोगववानो भाव छोडवा असमर्थ छे, परंतु तेमने ते प्रति आन्तरिक राग नथी.
श्रद्धा अने ज्ञानमां तेओ ते रागने अहितकर माने छे, तेथी जेवी रीते अज्ञानी भोगोने
हितकर समजी तेने एकताबुद्धिथी भोगवे छे, तेवी रीते ज्ञानीने भोगववानो भाव नथी.
तेने पर द्रव्यना स्वामीपणानो तथा कर्तापणानो अभिप्राय नथी. रागरूप परिणमन छे ते
चारित्रनी नबळाईथी छे. तेनो ते ज्ञाता छे, तेथी अज्ञानरूप कर्तापणुं के भोक्तापणुं तेने
नथी. ए अपेक्षाए ज्ञानी भोगोने सेवतो *होवा छतां ते सेवतो नथी, कारण के
* जुओ, श्री समयसार गा. १९५, १९६, १९७.