५६ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
तथा चोक्तम्
‘इदं फलमियं क्रिया करणमेतदेष क्रमो, व्ययोयमनुषङ्गजं फलमिदं दशेयं मम । अयं
सुहृदयं द्विषन् प्रयतदेशकालाविमाविति प्रतिवितर्कयन् प्रयतते बुधो नेतरः ।
किंच ‘यदर्थमेतदेवंविधमिति ।’ भद्र ! यत्कायलक्षणं वस्तुसंतापाद्युपेतं कर्तुकामेन भोगाः
प्रार्थ्यन्ते तद्द्वक्ष्यमाणलक्षणमित्यर्थः । स एवंविध इति पाठः । तद्यथा —
भवन्ति प्राप्त यत्सङ्गमशुचीनि शुचीन्यपि ।
स कायः संततापायस्तदर्थं प्रार्थना वृथा ।।१८।।
उत्थानिका — आचार्य फि र और भी कहते हैं कि जिस (काय) के लिए सब
कुछ (भोगोपभोगादि) किया जाता है वह (काय) तो महा अपवित्र है, जैसा कि आगे बताया
जाता है —
शुचि पदार्थ भी संग ते, महा अशुचि हो जाँय ।
विघ्न करण नित काय हित, भोगेच्छा विफलाय ।।१८।।
अर्थ — जिसके सम्बन्धको पाकर-जिसके साथ भिड़कर पवित्र भी पदार्थ अपवित्र
हो जाते हैं, वह शरीर हमेशा अपायों, उपद्रवों, झंझटों, विघ्नों एवं विनाशों कर सहित
है, अतः उसको भोगोपभोगोंको चाहना व्यर्थ है !
भोगववानी क्रिया वखते पण तेनुं ज्ञानरूप परिणमन छूटतुं नथी. अस्थिरताने लीधे जे
राग देखाय छे, तेनो अभिप्रायमां तेने निषेध छे. १७
आचार्य फरीथी कहे छे — वळी, जेना माटे ते छे ते आ प्रकारे छे — अर्थात् ‘भद्र!
जे शरीरना माटे तुं (अनेक) दुःखो वेठी (भोगोपभोगनी) वस्तुओ प्राप्त करवा इच्छे,
तेनुं लक्षण (स्वरूप) आगळ बताववामां आवे छे, एवो अर्थ छे ते आ प्रमाणे छेः —
शुचि पदार्थ जस संगथी, महा अशुचि थई जाय,
विघ्नरूप तस काय हिय, इच्छा व्यर्थ जणाय. १८.
अन्वयार्थ : — [यत्संगं ] जेनो संग [प्राप्य ] पामी [शुचीनि अपि ] पवित्र पदार्थो
पण [अशुचीनि ] अपवित्र [भवन्ति ] थई जाय छे, [सः कायः ] ते शरीर [सततापायः ] हंमेशां
बाधाओ (उपद्रव) सहित छे; तेथी [तदर्थं ] तेना माटे [प्रार्थना ] (भोगोपभोगनी) प्रार्थना
(आकांक्षा) करवी [वृथा ] व्यर्थ छे.