Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ५७
वर्तते कोऽसौ, सःकायःशरीरम् किंविशिष्टः ? संततापायः नित्यक्षुधाद्युपतापः
क, इत्याहयत्संगे येन कायेन सह संबन्धं प्राप्य लब्ध्वा शुचीन्यपि पवित्ररम्याण्यपि
भोजनवस्त्रादिवस्तुन्यशुचीनि भवन्ति यतश्चैवं ततस्तदर्थं तं संततापायं कायं शुचिवस्तुभिरुपकर्तुं
प्रार्थना आकाङ्क्षा तेषामेव वृथा व्यर्था केनचिदुपायेन निवारितेऽपि एकस्मिन्नपाये क्षणे
क्षणेऽपरापरापायोपनिपातसम्भवात्
पुनरप्याह शिष्य :‘तर्हि धनादिनाप्यात्मोपकारो भविष्यतीति ’ भगवन् !
विशदार्थजिस शरीरके साथ सम्बन्ध करके पवित्र एवं रमणिक भोजन, वस्त्र
आदिक पदार्थ अपवित्र घिनावने हो जाते हैं, ऐसा वह शरीर हमेशा भूख, प्यास आदि
संतापोंकर सहित है
जब वह ऐसा है तब उसको पवित्र अच्छे-अच्छे पदार्थोंसे भला
बनानेके लिये आकांक्षा करना व्यर्थ है, कारण कि किसी उपायसे यदि उसका एकाध अपाय
दूर भी किया जाय तो क्षण
क्षणमें दूसरेदूसरे अपाय आ खड़े हो सकते हैं ।।१८।।
उत्थानिकाफि र भी शिष्यका कहना है कि भगवन् कायके हमेशा अपायवाले
टीका :वर्ते छे. कोण ते? ते कायशरीर. केवुं (शरीर)? सतत (हंमेशा)
बाधावाळुं अर्थात् नित्य क्षुधादि बाधावाळुं छे. (शिष्य) पूछे छे‘‘ते कोण छे?’’ जेना
संगे अर्थात् जे शरीरनी साथे संबंध करीने (पामीने) पवित्र तथा रमणीय भोजन, वस्त्रादि
वस्तुओ पण अपवित्र थई जाय छे. एम छे तेथी तेने माटे अर्थात् ते सतत बाधावाळी
काया उपर पवित्र वस्तुओथी उपकार करवा माटे प्रार्थना एटले आकांक्षा (करवी) वृथा
एटले व्यर्थ छे, कारण के कोई उपायथी एकाद बाधा दूर करवामां आवे, छतां प्रतिक्षण
(क्षण
क्षण) बीजी बीजी बाधाओ आवी पडे तेवी संभावना छे.
भावार्थ :शरीर प्रत्येनो राग हंमेशां संतापजनक छे, कारण के तेना अंगे क्षुधा
तृषादि अनेक वेदनाओ उत्पन्न थाय छे, ते रोगनुं घर छे अने पवित्र तथा सुंदर भोजन
वस्त्रादि वस्तुओ पण तेना संपर्कथी मलिन, दुर्गंधित अने अपवित्र थई जाय छे.
आवा घृणित शरीरने सारुं राखवानी द्रष्टिए भोगोपभोगनी सामग्रीनी इच्छा करवी ते
निरर्थक छे.
वास्तवमां शरीरादि संतापनुं कारण नथी, परंतु तेना प्रत्येनो ममत्वभाव एकताबुद्धि
ते ज संतापनुं खरुं कारण छे. जेने शरीर प्रत्ये ममत्वभाव नथी, तेने शरीरने सारुं
राखवानी बुद्धिए भोगोपभोगनी सामग्रीनी चिंता के इच्छा रहेती नथी. १८.
फरीथी शिष्य कहे छेत्यारे धनादिथी पण आत्मानो उपकार थशे, अर्थात् भगवन्!