Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 19.

< Previous Page   Next Page >


Page 58 of 146
PDF/HTML Page 72 of 160

 

background image
५८ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
संततापायतया कायस्य धनादिना यद्युपकारो न स्यात्तर्हि धनादिनापि न केवलमनशनादि-
तपश्चरणेनेत्यपि शब्दार्थः
आत्मनो जीवस्योपकारोऽनुग्रहो भविष्यतीत्यर्थः
गुरुराह तन्नेति यत्त्वया धनादिना आत्मोपकारभवनं संभाज्यते तन्नास्ति यतः
यज्जीवस्योपकाराय तद्देहस्यापकारकम्
यद्देहस्योपकाराय तज्जीवस्यापकारकम् ।।१९।।
होनेसे यदि धनादिकके द्वारा कायका उपकार नहीं हो सकता, तो आत्माका
उपकार तो केवल उपवास आदि तपश्चर्यासे ही नहीं, बल्कि धनादि पदार्थोंसे भी हो
जायगा
आचार्य उत्तर देते हुए बोले, ऐसी बात नहीं है कारण कि
आतम हित जो करत है, सो तनको अपकार
जो तनका हित करत है, सो जियको अपकार ।।१९।।
अर्थजो जीव (आत्मा)का उपकार करनेवाले होते हैं, वे शरीरका अपकार (बुरा)
करनेवाले होते हैं जो चीजें शरीरका हित या उपकार करनेवाली होती हैं, वही चीजें
आत्माका अहित करनेवाली होती हैं
शरीर सतत बाधानुं कारण होवाथी तेना उपर धनादिथी उपकार न थाय, तो आत्मानो
उपकार केवळ उपवास आदि तपश्चर्याथी ज नहि, किन्तु धनादिथी पण थशे, आत्मानो
एटले जीवनो उपकार एटले अनुग्रह थशे एवो अर्थ छे.
गुरु कहे छेतेम नथी अर्थात् धनादिथी तुं आत्मानो उपकार थवो माने छे, पण
तेम नथी, कारण केः
जे आत्माने हित करे, ते तनने अपकार,
करे हित जे देहने, ते जीवने अपकार. १९.
अन्वयार्थ :[यत् ] जे [जीवस्य उपकाराय ] जीवने (आत्माने) उपकारक छे, [तद् ]
ते [देहस्य अपकारक ] देहने अपकारक [भवति ] छे [तथा ] अने [यद् ] जे [देहस्य उपकाराय ]
देहने उपकारक छे, [तद् ] ते [जीवस्य अपकारकं ] जीवने अपकारक [भवति ] छे.