Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Gyanyog Mimamsa.

< Previous Page   Next Page >


Page 109 of 370
PDF/HTML Page 137 of 398

 

background image
तेथी तुं ज ठाकोरजी थयो? तथा जो एक छो तो भेट करवी, प्रसाद करवो, ए बधुं जूठुं
थयुं. कारण के
एक थतां एवो व्यवहार संभवतो नथी. तेथी मात्र भोजनासक्त पुरुषो द्वारा
आवी कल्पना करवामां आवे छे.
वळी ठाकोरजीना माटे नृत्यगीतादिक करवामां तथा शीतग्रीष्मवसंतादि ॠतुओमां
संसारीओमां संभवती एवी विषयसामग्री एकठी करवी, इत्यादि कार्यो तेओ करे छे. त्यां नाम
तो ठाकोरजीनुं लेवुं, अने इन्द्रियविषय पोताना पोषवा, एवा बधा उपाय मात्र विषयासक्त
जीवोए ज कर्या छे. ठाकोरजीनो जन्म, विवाहादिक, राजभोग, शयन अने जागरणादिनी
कल्पना तेओ करे छे, ते जेम कोई छोकरा
छोकरी, गुड्डागुड्डीना खेल बनावी कुतूहल करे,
तेम आ पण कुतूहल करवा जेवुं ज छे. परमार्थरूप गुण तेमां कांई पण नथी. बाळ
ठाकोरजीनो स्वांग बनावी तेओ चेष्टा बतावे छे, तेमां ए वडे पोताना ज विषय
पोषण करे
अने कहे के‘‘आ पण भक्ति छे.’’ इत्यादि घणुं शुं कहीए? एवी एवी अनेक विपरीतता
सगुणभक्तिमां होय छे.
ए प्रमाणे बे प्रकारनी भक्तिवडे तेओ मोक्षमार्ग कहे छे, पण तेनुं स्वरूप मिथ्या
समजवुं.
हवे अन्यमत प्ररूपित ज्ञानयोगवडे मोक्षमार्गनुं स्वरूप बतावीए छीए.
ज्ञानयोग मीमांसा
एक अद्वैतसर्वव्यापी परमब्रह्मने जाणवो, तेने ज्ञान कहे छे. तेनुं मिथ्यापणुं तो
पहेलां ज कह्युं छे.
वळी पोताने सर्वथा शुद्ध ब्रह्मस्वरूप मानवो, कामक्रोधादिक वा शरीरादिकने भ्रमरूप
जाणवां तेने ज्ञान कहे छे, पण ए भ्रम छे. जो पोते शुद्ध छे तो मोक्षनो उपाय शा माटे
करे छे? पोते शुद्ध ब्रह्म ठर्यो त्यारे कर्तव्य शुं रह्युं? पोताने प्रत्यक्ष काम
क्रोधादिक थता देखाय
छे तथा शरीरादिकनो संयोग प्रत्यक्ष जोईए छीए. हवे एनो अभाव थशे त्यारे थशे, परंतु
वर्तमानमां एनो सद्भाव मानवो ए भ्रम केम कहेवाय?
वळी तेओ कहे छे के‘‘मोक्षनो उपाय करवो ए पण भ्रम छे. जेम दोरडी ते दोरडी
ज छे, तेने सर्प जाण्यो हतो ते भ्रम हतोए भ्रम मटतां ते दोरडी ज छे; तेम पोते तो
ब्रह्म ज छे, पण पोताने अशुद्ध मान्यो हतो ए ज भ्रम हतो. भ्रम मटतां पोते ब्रह्म ज
छे.’’ एम कहेवुं पण मिथ्या छे. जो पोते शुद्ध होय अने तेने अशुद्ध जाणे तो ते भ्रम
खरो, पण पोते काम
क्रोधादि सहित अशुद्ध थई रह्यो छे, तेने अशुद्ध जाणे तो ते भ्रम
शानो? शुद्ध जाणे तो भ्रम होय भ्रमथी पोताने जूठो शुद्ध मानवाथी शुं सिद्धि छे?
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ ११९