तेथी तुं ज ठाकोरजी थयो? तथा जो एक छो तो भेट करवी, प्रसाद करवो, ए बधुं जूठुं
थयुं. कारण के – एक थतां एवो व्यवहार संभवतो नथी. तेथी मात्र भोजनासक्त पुरुषो द्वारा
आवी कल्पना करवामां आवे छे.
वळी ठाकोरजीना माटे नृत्य – गीतादिक करवामां तथा शीत – ग्रीष्म – वसंतादि ॠतुओमां
संसारीओमां संभवती एवी विषयसामग्री एकठी करवी, इत्यादि कार्यो तेओ करे छे. त्यां नाम
तो ठाकोरजीनुं लेवुं, अने इन्द्रियविषय पोताना पोषवा, एवा बधा उपाय मात्र विषयासक्त
जीवोए ज कर्या छे. ठाकोरजीनो जन्म, विवाहादिक, राजभोग, शयन अने जागरणादिनी
कल्पना तेओ करे छे, ते जेम कोई छोकरा – छोकरी, गुड्डा – गुड्डीना खेल बनावी कुतूहल करे,
तेम आ पण कुतूहल करवा जेवुं ज छे. परमार्थरूप गुण तेमां कांई पण नथी. बाळ
ठाकोरजीनो स्वांग बनावी तेओ चेष्टा बतावे छे, तेमां ए वडे पोताना ज विषय – पोषण करे
अने कहे के – ‘‘आ पण भक्ति छे.’’ इत्यादि घणुं शुं कहीए? एवी एवी अनेक विपरीतता
सगुणभक्तिमां होय छे.
ए प्रमाणे बे प्रकारनी भक्तिवडे तेओ मोक्षमार्ग कहे छे, पण तेनुं स्वरूप मिथ्या
समजवुं.
हवे अन्यमत प्ररूपित ज्ञानयोगवडे मोक्षमार्गनुं स्वरूप बतावीए छीए.
✾ ज्ञानयोग मीमांसा ✾
एक अद्वैत – सर्वव्यापी परमब्रह्मने जाणवो, तेने ज्ञान कहे छे. तेनुं मिथ्यापणुं तो
पहेलां ज कह्युं छे.
वळी पोताने सर्वथा शुद्ध ब्रह्मस्वरूप मानवो, काम – क्रोधादिक वा शरीरादिकने भ्रमरूप
जाणवां तेने ज्ञान कहे छे, पण ए भ्रम छे. जो पोते शुद्ध छे तो मोक्षनो उपाय शा माटे
करे छे? पोते शुद्ध ब्रह्म ठर्यो त्यारे कर्तव्य शुं रह्युं? पोताने प्रत्यक्ष काम – क्रोधादिक थता देखाय
छे तथा शरीरादिकनो संयोग प्रत्यक्ष जोईए छीए. हवे एनो अभाव थशे त्यारे थशे, परंतु
वर्तमानमां एनो सद्भाव मानवो ए भ्रम केम कहेवाय?
वळी तेओ कहे छे के — ‘‘मोक्षनो उपाय करवो ए पण भ्रम छे. जेम दोरडी ते दोरडी
ज छे, तेने सर्प जाण्यो हतो ते भ्रम हतो – ए भ्रम मटतां ते दोरडी ज छे; तेम पोते तो
ब्रह्म ज छे, पण पोताने अशुद्ध मान्यो हतो ए ज भ्रम हतो. भ्रम मटतां पोते ब्रह्म ज
छे.’’ एम कहेवुं पण मिथ्या छे. जो पोते शुद्ध होय अने तेने अशुद्ध जाणे तो ते भ्रम
खरो, पण पोते काम – क्रोधादि सहित अशुद्ध थई रह्यो छे, तेने अशुद्ध जाणे तो ते भ्रम
शानो? शुद्ध जाणे तो भ्रम होय भ्रमथी पोताने जूठो शुद्ध मानवाथी शुं सिद्धि छे?
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ ११९