वळी अन्य पण घणां कथनो प्रमाणविरुद्ध कहे छे. जेम कहे छे के – सर्वार्थसिद्धिनो देव
मनथी ज प्रश्न करे छे, अने केवलीभगवान मनथी ज उत्तर आपे छे. हवे सामान्य जीवना
ज मननी वात मनःपर्यय ज्ञानी विना जाणी शके नहि, तो केवळीना मननी वात सर्वार्थसिद्धिनो
देव केवी रीते जाणे? वळी केवलीने भावमननो तो अभाव छे, तथा द्रव्यमन जड छे –
आकारमात्र छे, तो उत्तर कोणे आप्यो? माटे ए मिथ्या छे.
ए प्रमाणे अनेक प्रमाणविरुद्ध कथन कर्यां छे, माटे तेमनां आगम कल्पित जाणवां.
✾ श्वेतांबरमत कथित देव – गुरु – धार्मनुं अन्यथा स्वरुप ✾
श्वेतांबरमतवाळा देव – गुरु – धर्मनुं स्वरूप पण अन्यथा निरूपण करे छे.
देवनुं अन्यथा स्वरुप —
केवळीने क्षुधादिक दोष कहे छे, ए देवनुं अन्यथा स्वरूप छे. कारण के – क्षुधादिक दोष
होतां आकुलता होय त्यारे अनंत सुख केवी रीते बने? अहीं जो कहेशो के – ‘‘शरीरने क्षुधा
लागे छे, पण आत्मा तद्रूप थतो नथी’’ तो क्षुधादिकनो उपाय, आहारादिक ग्रहण कर्यो शा
माटे कहो छो? क्षुधादिवडे पीडित थाय, त्यारे ज आहार ग्रहण करे. जो कहेशो के – ‘‘जेम
कर्मोदयथी विहार थाय छे, ते ज प्रमाणे आहार ग्रहण थाय छे.’’ पण विहार तो
विहायोगतिप्रकृतिना उदयथी थाय छे, तथा ए पीडानो उपाय नथी, इच्छा विना पण कोई
जीवने थतो जोईए छीए; परंतु आहार छे, ते प्रकृतिना उदयथी नथी, क्षुधा वडे पीडित थतां
ज ग्रहण करे छे. वळी आत्मा पवनादिकने प्रेरे त्यारे ज तेनुं गळी जवुं थाय छे, माटे
विहारवत् आहार नथी.
जो कहेशो क — ‘‘शातावेदनीयना उदयथी आहार ग्रहण थाय छे,’’ तो ए पण बनतुं
नथी. कारण के – जे जीव क्षुधावडे पीडित होय, अने पाछळथी आहारादि ग्रहणथी सुख माने,
तेने आहारादिक शाताना उदयथी थयां कहेवाय. शातावेदनीयना उदयथी आहारादिकनुं ग्रहण
स्वयं थाय, एम तो नथी. जो एम होय तो शातावेदनीयनो मुख्य उदय देवोने छे, तो तेओ
निरंतर आहार केम करता नथी? वळी महामुनि उपवासादिक करे छे तेमने शातानो उदय
पण होय छे, त्यारे निरंतर भोजन करवावाळाने अशातानो उदय पण संभवे छे.
माटे जेम इच्छाविना पण विहायोगतिना उदयथी विहार संभवे छे, तेम इच्छा
विना केवळ शातावेदनीयना ज उदयथी आहार ग्रहण संभवतुं नथी. त्यारे ते कहे छे के –
‘‘सिद्धांतमां केवळीने क्षुधादिक अगियार परिषह कह्या छे, तेथी तेने क्षुधानो सद्भाव संभवे
छे. वळी आहारादिक विना तेनी (क्षुधानी) उपशांतता केवी रीते थाय? माटे तेने आहारादिक
मानीए छीए.’’
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ १४९