अहीं कोई कहे के – ‘‘अमे तो जेनामां यथार्थ आचरण देखीशुं, तेने ज साधु मानीशुं,
अन्यने नहि’’ तेने अमे पूछीए छीए के – ‘‘एक संघमां घणा वेषधारी छे, त्यां जेने यथार्थ
आचरण मानो छो, ते बीजाओने साधु माने छे के नहि? जो माने छे, तो ते तमाराथी
पण अश्रद्धानी थयो, तो पछी तेने पूज्य केवी रीते मानो छो! तथा नथी मानतो, तो तेनी
साथे साधुनो व्यवहार शामाटे राखो छो? वळी पोते तो तेने साधु न माने, पण पोताना
संघमां राखी बीजाओनी पासे साधु मनावी अन्यने अश्रद्धानी करे, एवुं कपट शामाटे करे?
वळी तमे जेने साधु मानता नथी, तो अन्य जीवोने पण एवो ज उपदेश आपशो के – ‘‘आने
साधु न मानो.’’ तो ए प्रमाणे तो धर्मपद्धतिमां विरुद्धता थाय! तथा जेने तमे साधु मानो
छो, तेनाथी पण तमारो विरोध थयो; कारण के – ते आने साधु माने छे. वळी तमे जेनामां
यथार्थ आचरण मानो छो, त्यां विचारवडे जुओ, तो ते पण यथार्थ मुनिधर्म पाळतो नथी.
अहीं कोई कहे – ‘‘अन्य वेषधारी करतां तो आ घणा सारा छे, तेथी अमे तेमने साधु
मानीए छीए.’’ पण अन्यमतिओमां तो नाना प्रकारना वेष संभवे, कारण के त्यां रागभावनो
निषेध नथी, पण आ जैनमतमां तो जेम कह्युं छे तेम ज थतां, साधुसंज्ञा होय.
अहीं कोई कहे के — ‘‘शील – संयमादि पाळे छे, तपश्चरणादि करे छे, तेथी जेटलुं
करे तेटलुं तो भलुं छे?’’
तेनुं समाधानः — ए सत्य छे. धर्म थोडो पण पाळवो भलो छे, परंतु प्रतिज्ञा तो
महानधर्मनी करवामां आवे अने पाळीए थोडो तो त्यां प्रतिज्ञाभंगथी महापाप थाय छे. जेम
कोई उपवासनी प्रतिज्ञा करी एकवार भोजन करे, तो तेने घणी वखत भोजननो संयम होवा
छतां पण, प्रतिज्ञाभंगथी पापी कहीए छीए. तेम मुनिधर्मनी प्रतिज्ञा करी कोई किंचित् धर्म
न पाळे तो तेने शील – संयमादि होवा छतां पण पापी ज कहेवाय तथा जेम कोई एकासणानी
प्रतिज्ञा करी एकवार भोजन करे, तो ते धर्मात्मा ज छे; तेम पोतानुं श्रावकपद धारण करी,
थोडुं पण धर्मसाधन करे, तो ते धर्मात्मा ज छे. पण अहीं तो उच्चनाम धरावी, नीची क्रिया
करवाथी पापीपणुं संभवे छे. जो यथायोग्य नाम धरावी धर्मक्रिया करतो होत तो पापीपणुं
थात नहि. जेटलो धर्म साधे तेटलो ज भलो छे.
अहीं कोई कहे के — ‘‘पंचमकाळना अंत सुधी चतुर्विधसंघनो सद्भाव कह्यो
छे. तेथी आमने साधु न मानीए तो कोने मानीए?’’
तेनो उत्तरः — जेम आ काळमां हंसनो सद्भाव कह्यो छे, तथा गम्यक्षेत्रमां हंस
देखाता नथी, तेथी कांई बीजाओने तो हंस मान्या जता नथी, हंस जेवुं लक्षण मळतां ज
हंस मान्या जाय तेम आ काळमां साधुनो सद्भाव छे तथा गम्यक्षेत्रमां साधु देखाता नथी,
तेथी कांई बीजाओने तो साधु मान्या जाय नहि, पण साधुनां लक्षण मळतां ज साधु मान्या
जाय. वळी एमनो पण आ काळमां थोडा ज क्षेत्रमां सद्भाव देखाय छे, त्यांथी दूर क्षेत्रमां
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ १५९