करवुं, तथा हिंसादिरूप व्यापार न करवो, इत्यादि तेनां अंगोनी तो मुख्यता नथी,
✾ मुखपÀी आदिनो निषेधा ✾
पण मुखपट्टी बांधवी अने शौचादिक थोडुं करवुं, इत्यादि कार्योनी तेओ मुख्यता करे
छे, पण मेलयुक्त पट्टीमां थूंकना संबंधथी जीव ऊपजे, तेनो तो यत्न नथी, पण पवननी
हिंसानो यत्न बतावे छे, तो नासिकाद्वारा घणो पवन नीकळे छे, तेनो यत्न केम करता नथी?
वळी तेमना शास्त्रानुसार जो बोलवानो ज यत्न कर्यो तो तेने (मुखपट्टीने) सर्वदा शामाटे राखो
छो? ज्यारे बोलो त्यारे यत्न करी लो! कहे छे के – ‘‘भूली जईए छीए.’’ हवे जो एटलुं
पण याद रहेतुं नथी. तो अन्य धर्मसाधन केवी रीते थशे? शौचादिक थोडां करो छो, पण
संभवित शौच तो मुनि पण करे छे, माटे गृहस्थोए पोताना योग्य शौच तो करवो. कारण
के – स्त्रीसंगमादि करी शौच कर्या विना सामायिकादि क्रिया करवाथी, अविनय – विक्षिप्ततादिवडे
पाप ऊपजे छे. ए प्रमाणे तेओ जेनी मुख्यता करे छे तेनुं पण ठेकाणुं नथी. तेओ दयानां
केटलांक अंग योग्य पाळे छे, हरितकाय आदिनो त्याग करे छे, जळ थोडुं नाखे छे, तेनो
अमे निषेध करता नथी.
✾ मूर्तिपूजा निषेधानुं निराकरण ✾
वळी एवी अहिंसानो एकांत पकडी तेओ प्रतिमा, चैत्यालय अने पूजनादि क्रियानुं
उत्थापन करे छे. पण तेमना ज शास्त्रोमां प्रतिमा आदिनुं निरूपण करे छे, तेने आग्रहथी
लोप करे छे. भगवती सूत्रमां ॠद्धिधारी मुनिनुं निरूपण छे, त्यां मेरुगिरि आदिमां
जई ‘‘तत्थ चेचयाइं वंदई’’ एवो पाठ छे. तेनो अर्थ – ‘‘त्यां चैत्योने वंदुं छुं.’’ हवे चैत्य
नाम प्रसिद्ध रीते प्रतिमानुं छे, छतां तेओ हठ करी कहे छे के – ‘‘चैत्य शब्दना ज्ञानादिक
अनेक अर्थ थाय छे, त्यां बीजा अर्थ छे, पण प्रतिमा अर्थ नथी.’’ हवे तेने पूछीए छीए
के – मेरुगिरि अने नंदीश्वरद्वीपमां जई त्यां चैत्यवंदना करी. हवे त्यां ज्ञानादिकनी वंदना करवानो
अर्थ केवी रीते संभवे? ज्ञानादिकनी वंदना तो सर्वत्र संभवे छे. पण जे वंदना योग्य चैत्य
होय त्यां ज संभवे तथा सर्वत्र न संभवे तेने, त्यां वंदना करवानो विशेष संभवे. हवे एवी
संभवित अर्थ प्रतिमा ज छे, तथा चैत्य शब्दनो मुख्य अर्थ पण प्रतिमा ज छे, ए प्रसिद्ध
छे. ए ज अर्थ वडे चैत्यालय नाम संभवे छे. तेने हठ करी शामाटे लोपो छो?
वळी देवादिक नंदीश्वरद्वीपादिमां जई पूजनादि क्रिया करे छे, तेनुं व्याख्यान तेमनामां
ज्यां – त्यां छे. तथा लोकमां पण ज्यां – त्यां अकृत्रिमप्रतिमानुं निरूपण छे. हवे ए रचना
अनादि छे. ते कांई भोग कुतूहलादि माटे तो नथी. तथा इन्द्रादिकोनां स्थानोमां निष्प्रयोजन
रचना संभवे नहि. हवे इन्द्रादिक तेने जोई शुं करे छे? कां तो पोताना मंदिरोमां ए
निष्प्रयोजन रचना जोई तेनाथी उदासीन थता हशे अने त्यां तेमने दुख थतुं हशे, पण ए
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ १६१