न होय, तथा राग – द्वेषनी अत्यंत तीव्रता होय त्यारे ज जे कारण नथी, तेने पण इष्ट –
अनिष्टनुं कारण माने छे त्यारे कुदेवोनी मान्यता थाय छे.
ए प्रमाणे तीव्र मिथ्यात्वादिभाव थतां, मोक्षमार्ग अति दुर्लभ थई जाय छे.
✾ कुगुरुना श्रद्धानादिकनो निषेधा ✾
हवे आगळ कुगुरुना श्रद्धानादिकनो निषेध करीए छीएः —
जे जीव विषय – कषायादिक अधर्मरूप तो परिणमे छे, अने मानादिकथी पोताने धर्मात्मा
मनावे छे, धर्मात्मायोग्य नमस्कारादि क्रिया करावे छे, किंचित् धर्मनुं कोई अंग धारी महान
धर्मात्मा कहेवडावे छे, तथा महान धर्मात्मा योग्य क्रिया करावे छे, ए प्रमाणे धर्मना आश्रयवडे
पोताने महान मनावे छे, ते बधा कुगुरु जाणवा. कारण के – धर्मपद्धतिमां तो विषय – कषायादि
छूटतां जेवो धर्म धारे, तेवुं ज पोतानुं पद मानवुं योग्य छे.
✾ कुळअपेक्षा गुरुपणानो निषेधा ✾
त्यां कोई तो कुळवडे पोताने गुरु माने छे. तेमां केटलाक ब्राह्मणादिक तो कहे छे के –
‘‘अमारुं कुळ ज उच्च छे, तेथी अमे सर्वना गुरु छीए.’’ पण कुळनी उच्चता तो धर्मसाधनथी
छे. जो कोई उच्चकुळमां ऊपजीने हीन आचरण करे, तो तेेने उच्च केवी रीते मानीए? जो
कुळमां ऊपजवाथी ज उच्चपणुं रहे, तो मांसभक्षणादि करवा छतां पण तेने उच्च ज मानो,
पण एम बने नहि. भारतग्रंथमां पण अनेक प्रकारना ब्राह्मणो कहे छे, त्यां ‘‘जे ब्राह्मण
थई चांडालकार्य करे, तेने चांडालब्राह्मण कहेवा,’’ एम कह्युं छे. जो कुळथी ज उच्चपणुं रहे,
तो एवी हीनसंज्ञा शा माटे आपी?
वळी वैष्णवशास्त्रोमां एवुं पण कह्युं छे के – ‘‘वेदव्यासादिक माछली आदिथी ऊपज्यां.’’
तो त्यां कुळनो अनुक्रम केवी रीते कह्यो? तथा मूळ उत्पत्ति तो ब्रह्माथी कहे छे, तेथी सर्वनुं
एक ज कुळ छे, भिन्न कुळ क्यां रह्युं? वळी उच्चकुळनी स्त्रीने नीचकुळना पुरुषथी तथा
नीचकुळनी स्त्रीने उच्चकुळना पुरुषथी संगम थतां संतति थती जोवामां आवे छे, त्यां उच्च –
नीच कुळनुं प्रमाण क्यां रह्युं?
प्रश्नः — जो एम छे, तो उच्च – नीच कुळनो विभाग शा माटे मानो छो?
उत्तरः — लौकिक कार्यमां तो असत्यप्रवृत्ति पण संभवे, परंतु धर्मकार्यमां तो असत्यता
संभवे नहि. माटे धर्मपद्धतिमां तो कुळ अपेक्षा महंतपणुं संभवतुं नथी, पण धर्मसाधनथी ज
महंतपणुं होय छे. ब्राह्मणादि कुळोमां जे महंतता छे, ते धर्मप्रवृत्तिथी छे; धर्मप्रवृत्ति छोडी
हिंसादिक पापप्रवृत्तिमां प्रवर्ततां महंतपणुं केवी रीते रहे?
वळी कोई कहे छे के – ‘‘अमारा पूर्ववडीलो महान भक्त थई गया छे, सिद्ध थया
छठ्ठो अधिकारः कुदेव-कुगुरु-कुधर्म-निराकरण ][ १७५