Niyamsar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
व्यवहारचारित्र अधिकार
[ ११५

इह हि पंचमव्रतस्वरूपमुक्त म्

सकलपरिग्रहपरित्यागलक्षणनिजकारणपरमात्मस्वरूपावस्थितानां परमसंयमिनां परम- जिनयोगीश्वराणां सदैव निश्चयव्यवहारात्मकचारुचारित्रभरं वहतां, बाह्याभ्यन्तरचतुर्विंशति- परिग्रहपरित्याग एव परंपरया पंचमगतिहेतुभूतं पंचमव्रतमिति

तथा चोक्तं समयसारे परनी अपेक्षा नथी एवी शुद्ध निरालंबन भावना सहित) [सर्वेषां ग्रन्थानां त्यागः] सर्व परिग्रहोनो त्याग (सर्वपरिग्रहत्यागसंबंधी शुभभाव) ते, [चारित्रभरं वहतः] चारित्रभर वहनारने [पंचमव्रतम् इति भणितम्] पांचमुं व्रत कह्युं छे.

टीकाःअहीं (आ गाथामां) पांचमा व्रतनुं स्वरूप कहेवामां आव्युं छे.

सकळ परिग्रहना परित्यागस्वरूप निज कारणपरमात्माना स्वरूपमां अवस्थित (स्थिर रहेला) परमसंयमीओनेपरम जिनयोगीश्वरोनेसदाय निश्चयव्यवहारात्मक सुंदर चारित्रभर वहनाराओने, बाह्य-अभ्यंतर चोवीश प्रकारना परिग्रहनो परित्याग ज

एवी रीते (श्रीमद्भगवत्कुंदकुंदाचार्यदेवप्रणीत) श्री समयसारमां (२०८मी गाथा द्वारा) कह्युं छे केः

शुभोपयोग ते व्यवहार अपरिग्रहव्रत कहेवाय छे. शुद्ध परिणति न होय त्यां शुभोपयोग हठ सहित होय छे; ते शुभोपयोग तो व्यवहार-व्रत पण कहेवातो नथी. [आ पांचमा व्रतनी माफक अन्य व्रतोनुं पण समजी लेवुं.]

विद्यमान ज नथी त्यां शुभोपयोगमां आरोप कोनो करवो?

परंपराए पंचमगतिना हेतुभूत एवुं पांचमुं व्रत छे.

१. चारित्रभर = चारित्रनो भार; चारित्रसमूह; चारित्रनी अतिशयता.
२. शुभोपयोगरूप व्यवहारव्रत शुद्धोपयोगनो हेतु छे अने शुद्धोपयोग मोक्षनो हेतु छे एम गणीने
अहीं उपचारथी व्यवहारव्रतने मोक्षनो परंपराहेतु कहेल छे. खरेखर तो शुभोपयोगी मुनिने
मुनियोग्य शुद्धपरिणति ज (शुद्धात्मद्रव्यने अवलंबती होवाथी) विशेष शुद्धिरूप शुद्धोपयोगनो हेतु
थाय छे अने ते शुद्धोपयोग मोक्षनो हेतु थाय छे. आ रीते आ शुद्धपरिणतिमां रहेला मोक्षना
परंपराहेतुपणानो आरोप तेनी साथे रहेला शुभोपयोगमां करीने व्यवहारव्रतने मोक्षनो
परंपराहेतु कहेवामां आवे छे. ज्यां शुद्धपरिणति ज न होय त्यां वर्तता शुभोपयोगमां मोक्षना
परंपराहेतुपणानो आरोप पण करी शकातो नथी, केम के ज्यां मोक्षनो यथार्थ परंपराहेतु
प्रगट्यो ज नथी