Niyamsar-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 91 Gatha: 67.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
व्यवहारचारित्र अधिकार
[ १२९

दर्शनचारित्रभेदाद् द्विधा संज्ञा आहारभयमैथुनपरिग्रहाणां भेदाच्चतुर्धा रागः प्रशस्ताप्रशस्तभेदेन द्विविधः असह्यजनेषु वापि चासह्यपदार्थसार्थेषु वा वैरस्य परिणामो द्वेषः इत्याद्यशुभपरिणामप्रत्ययानां परिहार एव व्यवहारनयाभिप्रायेण मनोगुप्तिरिति

(वसंततिलका)
गुप्तिर्भविष्यति सदा परमागमार्थ-
चिंतासनाथमनसो विजितेन्द्रियस्य
बाह्यान्तरङ्गपरिषङ्गविवर्जितस्य
श्रीमज्जिनेन्द्रचरणस्मरणान्वितस्य
।।9।।
थीराजचोरभत्तकहादिवयणस्स पावहेउस्स
परिहारो वयगुत्ती अलियादिणियत्तिवयणं वा ।।६७।।

छे. दर्शनमोह अने चारित्रमोह एवा (बे) भेदोने लीधे मोह बे प्रकारे छे. आहारसंज्ञा, भयसंज्ञा, मैथुनसंज्ञा अने परिग्रहसंज्ञा एवा (चार) भेदोने लीधे संज्ञा चार प्रकारे छे. प्रशस्त राग अने अप्रशस्त राग एवा (बे) भेदने लीधे राग बे प्रकारनो छे. असह्य जनो प्रत्ये अथवा असह्य पदार्थसमूहो प्रत्ये वैरनो परिणाम ते द्वेष छे.इत्यादि ज) व्यवहारनयना अभिप्रायथी मनोगुप्ति छे. [हवे ६६मी गाथानी टीका पूर्ण करतां टीकाकार मुनिराज श्लोक कहे छेः]

[श्लोकार्थः] जेनुं मन परमागमना अर्थोना चिंतनयुक्त छे, जे विजितेंद्रिय छे (अर्थात् जेणे इन्द्रियोने विशेषपणे जीती छे), जे बाह्य तेम ज अभ्यंतर संग रहित छे अने जे श्रीजिनेंद्रचरणना स्मरणथी संयुक्त छे, तेने सदा गुप्ति होय छे. ९१.

स्त्री-राज-भोजन-चोरकथनी हेतु छे जे पापनी
तसु त्याग, वा अलीकादिनो जे त्याग, गुप्ति वचननी. ६७.

*अशुभपरिणामप्रत्ययोनो परिहार ज (अर्थात् अशुभपरिणामरूप भावपापास्रवोनो त्याग

*प्रत्ययो = आस्रवो; कारणो. (संसारनां कारणोथी आत्मानुं गोपनरक्षण करवुं ते गुप्ति छे. भावपापास्रवो तेम ज भावपुण्यास्रवो संसारनां कारणो छे.)