Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
শ্রী দিগংবর জৈন স্বাধ্যাযমংদির ট্রস্ট, সোনগঢ - ৩৬৪২৫০
परिरक्षणं निश्चयशीलं तदपि तेषामेव । तउ द्वादशविधतपश्चरणबलेन परद्रव्येच्छानिरोधं कृत्वा
शुद्धात्मनि प्रतपनं विजयनं तप इति । तदपि तेषामेव । सुद्धहं शुद्धोपयोगिनां दंसणु
छद्मस्थावस्थायां स्वशुद्धात्मनि रुचिरूपं सम्यग्दर्शनं केवलज्ञानोत्पत्तौ सत्यां तस्यैव फ लभूतं
अनीहितविपरीताभिनिवेशरहित परिणामलक्षणं क्षायिकसम्यक्त्वं केवलदर्शनं वा तेषामेव । णाणु
वीतरागस्वसंवेदनज्ञानं तस्यैव फ लभूतं केवलज्ञानं वा सुद्धहं शुद्धोपयोगिनामेव । कम्मक्खउ
परमात्मस्वरूपोपलब्धिलक्षणो द्रव्यभावकर्मक्षयः हवइ तेषामेव भवति । सुद्धउ शुद्धोपयोग-
परिणामस्तदाधारपुरुषो वा तेण पहाणु येन कारणेन पूर्वोक्त ाः संयमादयो गुणाः शुद्धोपयोगे
लभ्यन्ते तेन कारणेन स एव प्रधान उपादेयः इति तात्पर्यम् । तथा चोक्तं शुद्धोपयोगफ लम् —
অধিকার-২ : দোহা-৬৭ ]পরমাত্মপ্রকাশ: [ ৩৩১
अपनेसे अपने आत्मामें प्रवृत्ति करना यह निश्चयशील, रागादिके त्यागनेसे शुद्ध भावकी रक्षा
करना वह भी निश्चयशील है, और देवांगना, मनुष्यनी, तिर्यंचनी तथा काठ पत्थर चित्रामादिकी
अचेतन स्त्री – ऐसे चार प्रकारकी स्त्रियोंका मन, वचन, काय, कृत, कारित, अनुमोदनासे त्याग
करना, वह व्यवहारशील है, ये दोनों शील शुद्ध चित्तवालोंके ही होते हैं । तप अर्थात् बारह
तरहका तप उसके बलसे भावकर्म, द्रव्यकर्म, नोकर्मरूप सब वस्तुओंमें इच्छा छोड़कर
शुद्धात्मामें मग्न रहना, काम क्रोधादि शत्रुओंके वशमें न होना, प्रतापरूप विजयरूप जितेंद्री
रहना । यह तप शुद्ध चित्तवालोंके ही होता है । दर्शन अर्थात् साधक अवस्थामें तो शुद्धात्मामें
रुचिरूप सम्यग्दर्शन और केवली अवस्थामें उस सम्यग्दर्शनका फ लरूप संशय, विमोह, विभ्रम
रहित निज परिणामरूप क्षायिकसम्यक्त्व केवलदर्शन यह भी शुद्धोंके ही होता है । ज्ञान अर्थात्
রাগাদিনো পরিহার করীনে ব্রতনুং সর্বপ্রকারে ত্যাগ বডে রক্ষণ করবুং তে নিশ্চযশীল ছে, তে পণ তেমনে
জ হোয ছে.
‘तउ’ বার প্রকারনা তপশ্চরণনা বলথী পরদ্রব্যনী ইচ্ছানো নিরোধ করীনে শুদ্ধ
আত্মামাং প্রতপন-বিজযন-তে তপ ছে, তে পণ তেমনে জ হোয ছে.
‘दंसणु’ ছদ্মস্থ-অবস্থামাং পোতানা শুদ্ধ আত্মানী রুচিরূপ সম্যগ্দর্শন অথবা
কেবলজ্ঞাননী উত্পত্তি থতাং তেনা জ ফলরূপ, বিপরীত অভিনিবেশ রহিত অনীহিত পরিণামরূপ
ক্ষাযিকসম্যক্ত্ব কে কেবলদর্শন পণ তেমনে জ হোয ছে.
‘णाणु’ বীতরাগ স্বসংবেদনরূপ জ্ঞান অথবা তেনা জ ফলরূপ কেবলজ্ঞান পণ শুদ্ধ
উপযোগীওনে জ হোয ছে.
‘कम्मक्खउ’ পরমাত্মস্বরূপনী প্রাপ্তিরূপ দ্রব্যভাবকর্মনো নাশ তেমনে জ হোয ছে.
‘सुद्धउ तेण पहाणु’ শুদ্ধোপযোগরূপ পরিণাম অথবা তে পরিণামনা ধারণ করনার
পুরুষ তে জ প্রধান ছে-উপাদেয ছে কারণ কে পূর্বোক্ত সংযমাদি গুণো শুদ্ধোপযোগমাং জ প্রাপ্ত হোয