Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Devanagari transliteration). Gatha: 86 (Adhikar 1).

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योगीन्दुदेवविरचितः
[ अधिकार-१ः दोहा-८६
भेदभावनां करोति ताद्रशीं क्रमेण सूत्रसप्तकेन विवृणोति
८६) अप्पा गोरउ किण्हु ण वि अप्पा रत्तु ण होइ
अप्पा सुहुमु वि थूलु ण वि णाणिउ जाणेँ जोइ ।।८६।।
आत्मा गौरः कृष्णः नापि आत्मा रक्त : न भवति
आत्मा सूक्ष्मोऽपि स्थूलः नापि ज्ञानी ज्ञानेन पश्यति ।।८६।।
आत्मा गौरो न भवति रक्तो न भवति आत्मा सूक्ष्मोऽपि न भवति स्थूलोऽपि नैव
तर्हि किंविशिष्टः ज्ञानी ज्ञानस्वरूपः ज्ञानेन करणभूतेन पश्यति अथवा ‘णाणिउ जाणइ
जोइं’ इति पाठान्तरं, ज्ञानी योऽसौ योगी स जानात्यात्मानम् अथवा ज्ञानी ज्ञानस्वरूपेण
आत्मा कोऽसौ जानाति योगीति तथाहिकृष्णगौरादिकधर्मान् व्यवहारेण जीवसंबद्धानपि
तथापि शुद्धनिश्चयेन शुद्धात्मनो भिन्नान् कर्मजनितान् हेयान् वीतरागस्वसंवेदनज्ञानी
स्वशुद्धात्मतत्त्वे तान् न योजयति संबद्धान्न करोतीति भावार्थः
।।८६।। अथ
भेदविज्ञानकी भावनाको करता है, वैसी भेदविज्ञान-भावनाका स्वरूप क्रमसे सात दोहा-सूत्रोंमें
कहते हैं
गाथा८६
अन्वयार्थ :[आत्मा ] आत्मा [गौरः कृष्णः नापि ] सफे द नहीं है, काला नहीं है,
[आत्मा ] आत्मा [रक्तः ] लाल [न भवति ] नहीं है, [आत्मा ] आत्मा [सूक्ष्मः अपि स्थूलः
नैव ] सूक्ष्म भी नहीं है, और स्थूल भी नहीं है, [ज्ञानी ] ज्ञानस्वरूप है, [ज्ञानेन ] ज्ञानदृष्टिसे
[पश्यति ] देखा जाता है, अथवा ज्ञानी पुरुष योगी ही ज्ञानकर आत्माको जानता है
।।
भावार्थ :ये श्वेत काले आदि धर्म व्यवहारनयकर शरीरके सम्बन्धसे जीवके कहे
जाते हैं, तो भी शुद्धनिश्चयनयकर शुद्धात्मासे जुदे हैं, कर्मजनित हैं, त्यागने योग्य हैं जो वीतराग
स्वसंवेदन ज्ञानी है, वह निज शुद्धात्मतत्त्वमें इन धर्मोंको नहीं लगाता, अर्थात् इनको अपने नहीं
समझता है
।।८६।।
भेदभावना करे छे, तेवी भेदभावना क्रमे करीने सात गाथासूत्रोथी कहे छेः
भावार्थकृष्ण, गौरादि धर्मो व्यवहारनयथी जीवनी साथे संबद्ध छे तोपण जे शुद्ध
निश्चयनयथी शुद्ध आत्माथी भिन्न छे, कर्मजनित छे, हेय छे, तेमने वीतराग स्वसंवेदनज्ञानी
स्वशुद्धात्मतत्त्वमां योजतो नथी अने संबद्ध करतो नथी. ए भावार्थ छे. ८६.