Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Devanagari transliteration). Gatha: 92 (Adhikar 1).

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योगीन्दुदेवविरचितः
[ अधिकार-१ः दोहा-९२
आत्मा पण्डितः मूर्खः नैव नैव ईश्वरः नैव निःस्वः
तरुणः वृद्धः बालः नैव अन्यः अपि कर्मविशेषः ।।९१।।
अप्पा पंडिउ मुक्खु णवि णवि ईसरु णवि णीसु तरुणउ बूढउ बालु णवि आत्मा
पण्डितो न भवति मूर्खो नैव ईश्वरः समर्थो नैव निःस्वो दरिद्रः तरुणो वृद्धो बालोऽपि नैव
पण्डितादिस्वरूपं यद्यात्मस्वभावो न भवति तर्हि किं भवति अण्णु वि कम्मविसेसु अन्य एव
कर्मजनितोऽयं विभावपर्यायविशेष इति तद्यथा पण्डितादिसंबन्धान् यद्यपि व्यवहारनयेन
जीवस्वभावान् तथापि शुद्धनिश्चयनयेन शुद्धात्मद्रव्याद्भिन्नान् सर्वप्रकारेण हेयभूतान्
वीतरागस्वसंवेदनज्ञानभावनारहितोऽपि बहिरात्मा स्वस्मिन्नियोजयति तानेव पण्डितादि-
विभावपर्यायांस्तद्विपरीतो योऽसौ चान्तरात्मा परस्मिन् कर्माणि नियोजयतीति तात्पर्यार्थः
।।९१।।
अथ
९२) पुण्णु वि पाउ वि कालु णहु धम्माधम्मु वि काउ
एक्कु वि अप्पा होइ णवि मेल्लिवि चेयणभाउ ।।९२।।
भावार्थ :यद्यपि शरीरके सम्बन्धसे पंडित वगैरह भेद व्यवहारनयसे जीवके कहे
जाते हैं, तो भी शुद्धनिश्चयनयकर शुद्धात्मद्रव्यसे भिन्न हैं, और सर्वथा त्यागने योग्य हैं इन
भेदोंको वीतरागस्वसंवेदनज्ञानकी भावनासे रहित मिथ्यादृष्टि जीव अपने जानता है, और इन्हींको
पंडितादि विभावपर्यायोंको अज्ञानसे रहित सम्यग्दृष्टि जीव अपनेसे जुदे कर्मजनित जानता
है
।।९१।।
आगे आत्माका चेतनभाव वर्णन करते हैं
जो पंडितादिस्वरूप आत्मानो स्वभाव नथी तो ते शुं छे? [अन्यः अपि कर्म विशेषः]
पंडितादि स्वरूप आत्माथी भिन्न कर्मविशेष छेअर्थात् कर्मजनित विभाव पर्याय विशेष छे.
भावार्थवीतरागस्वसंवेदनरूप ज्ञाननी भावनाथी रहित एवो बहिरात्मा,
पंडितादि संबंधो जो के व्यवहारनयथी जीवना स्वभावो छे तोपण शुद्धनिश्चयनयथी
शुद्धात्मद्रव्यथी भिन्न अने सर्वप्रकारे हेयभूत छे तेमने पोतामां योजे छे
जोडे छे अने तेनाथी
विपरीत जे अन्तरात्मा छे ते, ते ज पंडितादि विभावपर्यायोने पर एवा कर्ममां योजे छे.
(तेमने पोताथी जुदा कर्मजनित जाणे छे.) ए तात्पयार्थ छे. ९१.
हवे (आत्माना चेतनभावनुं वर्णन करे छे)ः