Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Devanagari transliteration).

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अधिकार-१ः दोहा-९३ ]परमात्मप्रकाशः [ १५३
अप्पा संजमु सीलु तउ अप्पा दंसणु णाणु अप्पा सासयमोक्खपउ आत्मा संयमो भवति
शीलं भवति तपश्चरणं भवति आत्मा दर्शनं भवति शाश्वतमोक्षपदं च भवति अथवा पाठान्तरं
‘सासयमुक्खपहुं’ शाश्वतमोक्षस्य पन्था मार्गः, अथवा ‘सासयसुक्खपउ’ शाश्वतसौख्यपदं स्वरूपं
च भवति
किं कुर्वन् सन् जाणंतउ अप्पाणु जानन्ननुभवन् कम् आत्मानमिति तद्यथा
बहिरङ्गेन्द्रियसंयमप्राणसंयमबलेन साध्यसाधकभावेन निश्चयेन स्वशुद्धात्मनि संयमनात्
स्थितिकरणात् संयमो भवति, बहिरङ्गसहकारिकारणभूतेन कामक्रोधविवर्जनलक्षणेन व्रतपरिरक्षण-
शीलेन निश्चयेनाभ्यन्तरे स्वशुद्धात्मद्रव्यनिर्मलानुभवनेन शीलं भवति
बहिरङ्गेन सहकारिकारण-
भावार्थ :पाँच इन्द्रियाँ और मनका रोकना व छह कायके जीवोंकी दयास्वरूप ऐसे
इन्द्रियसंयम तथा प्राणसंयम इन दोनोंके बलसे साध्य-साधक भावकर निश्चयसे अपने
शुद्धात्मस्वरूपमें स्थिर होनेसे आत्माको संयम कहा गया है, बहिरंग सहकारी निश्चय शीलका
कारणरूप जो काल क्रोधादिके त्यागरूप व्रतकी रक्षा वह व्यवहार शील है, और निश्चयनयकर
अंतरंगमें अपने शुद्धात्मद्रव्यका निर्मल अनुभव वह शील कहा जाता है, सो शीलरूप आत्मा
ही कहा गया है, बाह्य सहकारी कारणभूत जो अनशनादि बारह प्रकारका तप है, उससे तथा
निश्चयकर अंतरंगमें सब परद्रव्यकी इच्छाके रोकनेसे परमात्मस्वभाव (निजस्वभाव) में
प्रतापरूप तिष्ठ रहा है, इस कारण और समस्त विभावपरिणामोंके जीतनेसे आत्मा ही ‘तपश्चरण
है, और आत्मा ही निजस्वरूपकी रुचिरूप सम्यक्त्व है, वह सर्वथा उपादेयरूप है, इससे
सम्यग्दर्शन आत्मा ही है, अन्य कोई नहीं है, वीतराग स्वसंवेदनज्ञानके अनुभवसे आत्मा ही
है, अन्य कोई नहीं है, वीतरागसंवेदनज्ञानके अनुभवसे आत्मा ही निश्चयज्ञानरूप है, और
भावार्थसाध्यसाधक भाव वडे बहिरंग इन्द्रिय संयम अने प्राणसंयमना बळथी
निश्चये स्वशुद्धात्मामां संयमित रहेवुंस्थिति करवीते संयम छे.
बहिरंग सहकारीकारणभूत कामक्रोधादिना त्यागस्वरूप व्रतरक्षणरूप शील वडे निश्चयथी
अभ्यंतरमां स्वशुद्धात्मद्रव्यनो निर्मळ अनुभव करवो ते शील छे.
बहिरंग सहकारीकारणभूत अनशनादि बार प्रकारना तपश्चरण वडे निश्चयनयथी
अभ्यंतरमां समस्त परद्रव्यनी इच्छानो निरोध करीने परमात्मस्वभावमां प्रतपवुं-विजयवंत वर्तवुं,
ते तपश्चरण छे.
‘स्वशुद्धात्मा’ ज उपादेय छे एवी रुचि करवी ते निश्चयसम्यक्त्व छे. वीतराग-
स्वसंवेदनरूप ज्ञाननुं अनुभवन ते निश्चयज्ञान छे. मिथ्यात्व, रागादि समस्त विकल्पजाळनो त्याग
करीने परमात्मतत्त्वमां परमसमरसीभावनुं परिणमन ते मोक्षमार्ग छे.