सम्यक्त्वं भवति, तथापि निश्चयेन वीतरागपरमानन्दैकस्वभावः शुद्धात्मोपादेय इति
रुचिरूपपरिणामपरिणतशुद्धात्मैव निश्चयसम्यक्त्वं भवति
निश्चयज्ञानं भवति
[जानीहि ] तू जान, अर्थात् आत्मा ही दर्शन ज्ञान चारित्र है, ऐसा संदेह रहित जानो
व्यवहार साधक है, निश्चय साध्य है, तो भी निश्चयनयकर एक वीतराग परमानंदस्वभाववाला
शुद्धात्मा ही उपादेय है, ऐसा रुचिरूप परिणामसे परिणत हुआ शुद्धात्मा ही निश्चयसम्यक्त्व है,
यद्यपि निश्चयस्वसंवेदनज्ञानका साधक होनेसे व्यवहारनयकर शास्त्रका ज्ञान भी ज्ञान है, तो भी
निश्चयनयकर वीतरागस्वसंवेदनज्ञानरूप परिणत हुआ शुद्धात्मा ही निश्चयज्ञान है
कहे जाते हैं, तो भी शुद्धात्मानुभूतिरूप वीतराग-चारित्रको परिणत हुआ निज शुद्धात्मा ही
निश्चयनयथी वीतराग परमानंद जेनो एक स्वभाव छे एवो शुद्ध आत्मा उपादेय छे , एवी
रुचिरूप परिणामे परिणमेलो शुद्ध आत्मा ज निश्चयसम्यक्त्व छे; जो के शास्त्रज्ञान
निश्चयस्वसंवेदनज्ञाननुं साधक होवाथी व्यवहारथी ज्ञान छे, तोपण निश्चयनयथी
वीतरागस्वसंवेदनज्ञानरूपे परिणमेलो शुद्ध आत्मा ज निश्चयज्ञान छे; जो के व्यवहारनयथी मूळ
-उत्तर गुणो (अठ्ठावीस मूळ गुणो, चोरासीलाख उत्तर गुणो) निश्चयचारित्रना साधक होवाथी
चारित्र छे तोपण निश्चयनयथी शुद्धात्मानुभूतिरूप वीतरागचारित्ररूपे परिणमेलो स्वशुद्धात्मा ज
चारित्र छे.