अधिकार-१ः दोहा-९५ ]परमात्मप्रकाशः [ १५७
किं कृत्वा । अप्पा विमलु मुएवि मुक्त्वा त्यक्त्वा । कम् । आत्मानम् । कथंभूतम् । विमलं
रागादिरहितमिति । तथाहि । यद्यपि व्यवहारनयेन निर्वाणस्थानचैत्यचैत्यालयादिकं
तीर्थभूतपुरुषगुणस्मरणार्थं तीर्थं भवति, तथापि वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरूपनिश्छिद्रपोतेन
संसारसमुद्रतरणसमर्थत्वान्निश्चयनयेन स्वात्मतत्त्वमेव तीर्थं भवति १
यदुपदेशात्पारंपर्येण
परमात्मतत्त्वलाभो भवतीति । व्यवहारेण शिक्षादीक्षादायको यद्यपि गुरुर्भवति, तथापि
निश्चयनयेन पञ्चेन्द्रियविषयप्रभृतिसमस्तविभावपरिणामपरित्यागकाले संसारविच्छित्तिकारणत्वात्
स्वशुद्धात्मैव गुरुः । यद्यपि प्राथमिकापेक्षया सविकल्पापेक्षया चित्तस्थितिकरणार्थं
तीर्थंकरपुण्यहेतुभूतं साध्यसाधकभावेन परंपरया निर्वाणकारणं च जिनप्रतिमादिकं व्यवहारेण देवो
जिनमंदिर आदि तीर्थ हैं, क्योंकि वहाँसे गये महान् पुरुषोंके गुणोंकी याद होती है, तो भी
वीतराग निर्विकल्पसमाधिरूप छेद रहित जहाजकर संसाररूपी समुद्रके तरनेको समर्थ जो निज
आत्मतत्त्व है, वही निश्चयकर तीर्थ है, उसके उपदेश-परम्परासे परमात्मतत्त्वका लाभ होता है ।
यद्यपि व्यवहारनयकर दीक्षा शिक्षाका देनेवाला दिगंबर गुरु होता है, तो भी निश्चयनयकर विषय
कषाय आदिक समस्त विभावपरिणामोंके त्यागनेके समय निज शुद्धात्मा ही गुरु है, उसीसे
संसारकी निवृत्ति होती है । यद्यपि प्रथम अवस्थामें चित्तकी स्थिरताके लिये व्यवहारनयकर
जिनप्रतिमादिक देव कहे जाते हैं, और वे परंपरासे निर्वाणके कारण हैं, तो भी निश्चयनयकर
परम आराधने योग्य वीतराग निर्विकल्पपरमसमाधिके समय निज शुद्धात्मभाव ही देव हैं, अन्य
नहीं । इसप्रकार निश्चय व्यवहारनयकर साध्य-साधक-भावसे तीर्थ गुरु देवका स्वरूप जानना
चाहिये । निश्चयदेव, निश्चयगुरु, निश्चयतीर्थ निज आत्मा ही है, वही साधने योग्य है, और
(मंदिर) वगेरे तीर्थरूप पुरुषना गुणना स्मरणार्थे तीर्थ छे तोपण, वीतराग निर्विकल्प समाधिरूप
छिद्र रहित जहाज वडे संसारसमुद्रने तरवाने समर्थ होवाथी निश्चयनयथी स्वआत्मतत्त्व ज तीर्थ
छे – के जेना उपदेशथी परंपराए परमात्मानी प्राप्ति थाय छे.
जो के व्यवहारनयथी शिक्षा, दीक्षाना देनार गुरु छे तोपण, निश्चयनयथी पंचेन्द्रियना
विषय (कषाय) आदिथी मांडीने समस्त विभावपरिणामना त्याग समये संसारना नाशनुं कारण
होवाथी ‘स्वशुद्धात्मा’ ज गुरु छे.
जो के प्राथमिक अपेक्षाए-सविकल्प अपेक्षाए – चित्तने स्थिर करवा माटे तीर्थंकरना पुण्यना
हेतुरूप अने साध्यसाधक भावथी परंपराए निर्वाणनुं कारण एवी जिनप्रतिमादिक व्यवहारथी देव
कहेवाय छे तोपण, निश्चयनयथी परम आराध्य होवाथी वीतराग निर्विकल्प त्रिगुप्तियुक्त
परमसमाधिकाळे ‘स्वशुद्धात्मस्वभाव’ ज देव छे.
१ पाठान्तरः — य = त