Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Devanagari transliteration).

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अधिकार-१ः दोहा-९६ ]परमात्मप्रकाशः [ १५९
अण्णु सव्वु ववहारु अन्यः शेषः सर्वोऽपि व्यवहारः तेन कारणेन एक्कु जि जोइय झाइयइ
हे योगिन्, एक एव ध्यायते यः आत्मा कथंभूतः जो तइलोयहं सारु यः परमात्मा
त्रैलोक्यस्य सारभूत इति तद्यथा वीतरागचिदानन्दैकस्वभावात्मतत्त्वसम्यक्श्रद्धान-
ज्ञानानुभूतिरूपाभेदरत्नत्रयलक्षणनिर्विकल्पत्रिगुप्तिसमाधिपरिणतो निश्चयनयेन स्वात्मैव सम्यक्त्वं
अन्यः सर्वोऽपि व्यवहारस्तेन कारणेन स एव ध्यातव्य इति
अत्र यथा द्राक्षा-
कर्पूरश्रीखण्डादिबहुद्रव्यैर्निष्पन्नमपि पानकमभेदविवक्षया कृत्वैकं भण्यते, तथा शुद्धा-
त्मानुभूतिलक्षणैर्निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रैर्बहुभिः परिणतो अनेकोऽप्यात्मात्वभेदविवक्षया
एकोऽपि भण्यत इति भावार्थः
तथा चोक्तं अभेदरत्नत्रयलक्षणम्‘‘दर्शनमात्म-
विनिश्चितिरात्मपरिज्ञानमिष्यते बोधः स्थितिरात्मन चारित्रं कुत एतेभ्यो भवति
बन्धः ।।’’ ।।९६।।
अनुभवरूप जो अभेदरत्नत्रय वही जिसका लक्षण है, तथा मनोगुप्ति आदि तीन गुप्तिरूप
समाधिमें लीन निश्चयनयसे निज आत्मा ही निश्चयसम्यक्त्व है, अन्य सब व्यवहार है
इस
कारण आत्मा ही ध्यावने योग्य है जैसे दाख, कपूर, चन्दन इत्यादि बहुत द्रव्योंसे बनाया गया
जो पीनेका रस यद्यपि अनेक रसरूप है, तो भी अभेदनयकर एक पानवस्तु कही जाती है,
उसी तरह शुद्धात्मानुभूतिस्वरूप निश्चयसम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रादि अनेक भावोंसे परिणत हुआ
आत्मा अनेकरूप है, तो भी अभेदनयकी विवक्षासे आत्मा एक ही वस्तु है
यही
अभेदरत्नत्रयका स्वरूप जैन सिद्धान्तोंमें हरएक जगह कहा है‘‘दर्शनमित्यादि’’ इसका अर्थ
ऐसा है, कि आत्माका निश्चय वह सम्यग्दर्शन है, आत्माका जानना वह सम्यग्ज्ञान है, और
भावार्थनिश्चयनयथी वीतराग चिदानंद ज जेनो एक स्वभाव छे एवा
आत्मतत्त्वनां सम्यक्श्रद्धान, सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्अनुभूतिरूप अभेदरत्नत्रयस्वरूप अने
निर्विकल्प त्रिगुप्तियुक्त समाधिमां परिणमेलो स्वात्मा ज सम्यक्त्व छे, बाकीनो बधोय व्यवहार
छे, तेथी ते ज (स्वात्मा ज) ध्याववा योग्य छे.
अहीं जेवी रीते द्राक्ष, कपूर, चंदनादि अनेक द्रव्योथी बनेल पानक अभेद विवक्षाए
करीने एक ज कहेवाय छे, तेवी रीते शुद्धआत्मानी अनुभूतिस्वरूप निश्चयसम्यग्दर्शन-
ज्ञानचारित्रात्मक अनेक भावोरूपे परिणमेलो आत्मा अनेक होवा छतां अभेदविवक्षाथी एक ज
कहेवाय छे, एवो भावार्थ छे. (श्री अमृतचंद्राचार्य कृत पुरुषार्थसिद्ध्युपाय गाथा २१६मां)
अभेदरत्नत्रयनुं स्वरूप ए ज प्रमाणे कह्युं छे केः
‘‘दर्शनमात्मविनिश्चितिरात्मपरिज्ञानमिष्यते बोधः
स्थितिरात्मनि चारित्रं कुत एतेभ्यो भवति बंधः ।।’’ अर्थआत्माना स्वरूपनो निश्चय थवो ते
सम्यग्दर्शन छे, आत्माना स्वरूपनुं परिज्ञान थवुं ते सम्यग्ज्ञान छे अने आत्मस्वरूपमां लीन