Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Devanagari transliteration).

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अधिकार-१ः दोहा-९७ ]परमात्मप्रकाशः [ १६१
लब्भइ यं परमात्मानं ध्यायमानानां परमपदं लभ्यते केन कारणभूतेन एक्कखणेण
एकक्षणेनान्तर्मुहूर्तेनापि तथाहि समस्तशुभाशुभसंकल्पविकल्परहितेन स्वशुद्धात्म-
तत्त्वध्यानेनान्तर्मुहूर्तेन मोक्षो लभ्यते तेन कारणेन तदेव निरन्तरं ध्यातव्यमिति तथा चोक्तं
बृहदाराधनाशास्त्रे षोडशतीर्थंकराणां एकक्षणे तीर्थकरोत्पत्तिवासरे प्रथमे श्रामण्यबोधसिद्धिः
अन्तर्मुहूर्तेन निर्वृत्ता अत्राह शिष्यः यद्यन्तर्मुहूर्तपरमात्मध्यानेन मोक्षो भवति तर्हि
इदानीमस्माकं तद्धयानं कुर्वाणानां किं न भवति परिहारमाह याद्रशं तेषां
प्रथमसंहननसहितानां शुक्लध्यानं भवति ताद्रशमिदानीं नास्तीति तथा चोक्त म्‘‘अत्रेदानीं
निषेधन्ति शुक्लध्यानं जिनोत्तमाः धर्मध्यानं पुनः प्राहुः श्रेणिभ्यां प्राग्विवर्तिनम् ।।’’ अत्र
बृहदाराधना-शास्त्रमें कहा है सोलह तीर्थंकरोंके एक ही समय तीर्थंकरोंके उत्पत्तिके दिन
पहले चारित्र ज्ञानकी सिद्धि हुई, फि र अंतर्मुहूर्तमें मोक्ष हो गया यहाँ पर शिष्य प्रश्न करता
है कि यदि परमात्माके ध्यानसे अंतर्मुहूर्तमें मोक्ष होता है, तो इस समय ध्यान करनेवाले हम
लोगोंको क्यों नहीं होता ? उसका समाधान इस तरह है
कि जैसा निर्विकल्प शुक्लध्यान
वज्रवृषभनाराचसंहननवालोंको चौथे कालमें होता है, वैसा अब नहीं हो सकता ऐसा ही दूसरे
ग्रंथोंमें कहा है‘‘अत्रेत्यादि’’ इसका अर्थ यह है, कि श्रीसर्वज्ञवीतरागदेव इस भरतक्षेत्रमें
इस पंचमकालमें शुक्लध्यानका निषेध करते हैं, इस समय धर्मध्यान हो सकता है, शुक्लध्यान
नहीं हो सकता
उपशमश्रेणी और क्षपकश्रेणी दोनों ही इस समय नहीं हैं, सातवाँ गुणस्थान
अन्तर्मुहूर्तमां मोक्ष मळे छे तेथी ते ज निरंतर ध्याववा योग्य छे. बृहदाराधना शास्त्रमां पण
कह्युं छे केः‘‘षोडशतीर्थंकराणां एकक्षणे तीर्थकरोत्पत्तिवासरे प्रथमे श्रामण्यबोधसिद्धिः अन्तर्मुहूर्तेन
निवृता (अर्थ :ॠषभनाथथी मांडीने शांतिनाथ तीर्थंकर सुधी सोळ तीर्थंकरोने जे दिवसे
दिव्यध्वनिनी उत्पत्ति थई हती ते प्रथम दिवसे बहु मुनिओने श्रामण्यबोधसिद्धि (चारित्र अने
केवळज्ञाननी सिद्धि) एक क्षणे-अन्तर्मुहूर्तमां-थई).
अहीं, शिष्य प्रश्न करे छे केजो परमात्माना ध्यानथी अन्तर्मुहूर्तमां मोक्ष थाय छे तो
अत्यारे तेनुं ध्यान करनारा अमने केम मोक्ष थतो नथी?
तेनुं समाधानःप्रथम संहननवाळाने (वज्रवृषभनाराचसंहननवाळा जीवोने) जेवुं
शुक्लध्यान थाय छे तेवुं शुक्लध्यान अत्यारे थतुं नथी, (श्री रामसेनकृत तत्त्वानुशासन गाथा
८३मां) कह्युं पण छे के
‘‘अत्रेदानीं निषेधन्ति शुक्लध्यानं जिनोत्तमाः धर्मध्यानं पुनः प्राहुः श्रेणिभ्यां
प्राग्विवर्तिनाम् ।।’’ अर्थसर्वज्ञवीतरागजिनवरदेवे आ भरतक्षेत्रमां अत्यारे (आ पंचमकाळमां)
१. पाठान्तरःकारणभूतेन=करणभूतेन
२. आ गाथा संस्कृत टीकावाळी भगवती आराधनामां पान १७७१, गाथा २२२८मां छे.