Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Devanagari transliteration).

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अधिकार-१ः दोहा-१०७ ]परमात्मप्रकाशः [ १७५
कस्मात् णाणु वियाणइ जेण ज्ञानं कर्तृ विजानात्यात्मानं येन कारणेन अतः कारणात् तिण्णि
वि मिल्लिवि जाणि तुहुं त्रीण्यपि मुक्त्वा जानीहि त्वं हे प्रभाकरभट्ट, अप्पा णाणें तेण कं
जानीहि आत्मानम् केन ज्ञानेन तेन कारणेनेति तथाहि निजशुद्धात्मा ज्ञानस्यैव गम्यः
कस्मादिति चेत् मतिज्ञानादिकपञ्चविकल्परहितं यत्परमपदं परमात्मशब्दवाच्यं साक्षान्मोक्षकारणं
तद्रूपो योऽसौ परमात्मा तमात्मानं वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानगुणेन विना दुर्धरानुष्ठानं
कुर्वाणाअपि बहवोऽपि न लभन्ते यतः कारणात्
तथा चोक्तं समयसारे‘‘णाणगुणेण
विहीणा एयं तु पयं बहू वि ण लहंते तं गिण्ह णियदमेदं जदि इच्छसि दुक्खपरिमोक्खं ।।’’
अत्र धर्मार्थकामादिसर्वपरद्रव्येच्छां योऽसौ मुञ्चति स्वशुद्धात्मसुखामृते तृप्तो भवति स एव
निःपरिग्रहो भण्यते स एवात्मानं जानातीति भावार्थः
उक्तं च‘‘अपरिग्गहो अणिच्छो
पाँच भेदों रहित जो परमात्म शब्दका अर्थ परमपद है वही साक्षात् मोक्षका कारण है, उस
स्वरूप परमात्माको वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदन ज्ञानके बिना दुर्धर तपके करनेवाले भी बहुतसे
प्राणी नहीं पाते
इसलिये ज्ञानसे ही अपना स्वरूप अनुभव कर ऐसा ही कथन
श्रीकुंदकुंदाचार्यने समयसारजीमें किया है ‘‘णाणगुणेहिं’’ इत्यादि इसका अर्थ यह है, कि
सम्यग्ज्ञाननामा निज गुणसे रहित पुरुष इस ब्रह्मपदको बहुत कष्ट करके भी नहीं पाते, अर्थात्
जो महान दुर्धर तप करो तो भी नहीं मिलता
इसलिये जो तू दुःखसे छूटना चाहता है,
सिद्धपदकी इच्छा रखता है, तो आत्मज्ञानकर निजपदको प्राप्त कर यहाँ सारांश यह है कि,
जो धर्म-अर्थ-कामादि सब परद्रव्यकी इच्छाको छोड़ता है, वही निज शुद्धात्मसुखरूप अमृतमें
तृप्त हुआ सिद्धांतमें परिग्रह रहित कहा जाता है, और निर्ग्रंथ कहा जाता है, और वही अपने
आत्माको जानता है
ऐसा ही समयसारमें कहा है ‘‘अपरिग्गहो’’ इत्यादि इसका अर्थ ऐसा
‘परमात्म’ शब्दथी वाच्य जे परमपद साक्षात् मोक्षनुं कारण छे, तद्रूप जे परमात्मा छे ते आत्माने
वीतराग निर्विकल्प स्वसंवेदनरूप ज्ञानगुण विना दुर्धर अनुष्ठान करवा छतां पण घणा पुरुषो
पामता नथी. श्री समयसार (गाथा २०५)मां कह्युं पण छे के
‘‘णाणगुणेण विहीणा एयं तु पयं बहू वि ण लहंते तं गिण्ह णियदमेदं जदि इच्छसि
कम्मपरिमोक्खं ।। [अर्थज्ञानगुणथी रहित घणाय लोको (घणा प्रकारनां कर्म करवा छतां) आ
ज्ञानस्वरूप पदने पामता नथी; माटे हे भव्य! जो तुं कर्मथी सर्वथा मुक्त थवा इच्छतो हो
तो आ नियत एवा आने (ज्ञानने) ग्रहण कर.]
अहीं धर्म, अर्थ, कामादि सर्व परद्रव्यनी इच्छाने जे छोडे छे अने स्वशुद्धात्मसुखामृतमां
तृप्त थाय छे ते ज निःपरिग्रही कहेवामां आवे छे, ते ज पोताना आत्माने जाणे छे, एवो
भावार्थ छे. (श्री समयसार गाथा २१०मां) कह्युं पण छे के
‘‘अपरिग्गहो अणिच्छो भणिदो णाणि