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योगीन्दुदेवविरचितः
[ अधिकार-१ः दोहा-१११
पुनरपि कथंभूतः । ज्ञानमयः केवलज्ञानेन निर्वृत्तः सो वुच्चइ परलोउ स एवंगुणविशिष्टः
शुद्धात्मा परलोक इत्युच्यते इति । पर उत्कृष्टो वीतरागचिदानन्दैकस्वभाव आत्मा तस्य
लोकोऽवलोकनं निर्विकल्पसमाधौ वानुभवनमिति परलोकशब्दस्यार्थंः, अथवा लोक्यन्ते
द्रश्यन्ते जीवादिपदार्था यस्मिन् परमात्मस्वरूपे यस्य केवलज्ञानेन वा स भवति लोकः
परश्चासौ लोकश्च परलोकः व्यवहारेण पुनः स्वर्गापवर्गलक्षणः परलोको भण्यते । अत्र
योऽसौ परलोकशब्दवाच्यः परमात्मा स एवोपादेय इति तात्पर्यार्थः ।।११०।। अथ —
१११) सो पर वुच्चइ लोउ परु जसु मइ तित्थु वसेइ ।
जहिँ मइ तहिँ गइ जीवह जि णियमेँ जेण हवेइ ।।१११।।
सः परः उच्यते लोकः परः यस्य मतिः तत्र वसति ।
यत्र मतिः तत्र गतिः जीवस्य एव नियमेन येन भवति ।।१११।।
परलोक है । अथवा जिसके परमात्मस्वरूपमें या केवलज्ञानमें जीवादि पदार्थ देखे जावें,
इसलिये उस परमात्माका नाम परलोक है । अथवा व्यवहारनयकर स्वर्ग-मोक्षको परलोक कहते
हैं । स्वर्ग और मोक्षका कारण भगवानका धर्म है, इसलिये केवली भगवान्को परलोक कहते
हैं । परमात्माके समान अपना निज आत्मा है, वही परलोक है, वही उपादेय है ।।११०।।
आगे ऐसा कहते हैं, जिसका मन निज आत्मामें बस रहा है, वही ज्ञानी जीव परलोक
है —
गाथा – १११
अन्वयार्थ : — [यस्य मतिः ] जिस भव्य जीवकी बुद्धि [तत्र ] उस निज
आत्मस्वरूपमें [वसति ] बस रही है, अर्थात् विषय-कषाय-विकल्प-जालके त्यागसे
स्वसंवेदन – ज्ञानस्वरूपकर स्थिर हो रही है । [स ] वह पुरुष [परः ] निश्चयनयकर [परः
शब्दनो अर्थ छे, अथवा जे परमात्मस्वरूपमां अथवा जेना केळवज्ञानथी जीवादि पदार्थो देखाय
छे-जणाय छे ते लोक छे परम लोक (परमात्मा) परलोक छे, अने व्यवहारनयथी स्वर्गमोक्षने
परलोक कह्यो छे.
अहीं, ‘परलोक’ शब्दथी वाच्य एवो जे परमात्मा छे ते ज उपादेय छे, एवो तात्पर्यार्थ
छे. ११०.
हवे, जेनुं मन निज आत्मामां वसे छे ते ज्ञानी जीव परलोक छे, एम कहे छेः —