यद्यपि वज्रवृषभनाराचसंहननरूपेण पुद्गलद्रव्यं मुक्ति गमनकाले सहकारिकारणं भवति तथापि
धर्मद्रव्यं च गतिसहकारिकारणं भवति, अधर्मद्रव्यं च लोकाग्रे स्थितस्य स्थितिसहकारिकारणं
भवति । यद्यपि मुक्तात्मप्रदेशमध्ये परस्परैकक्षेत्रावगाहेन तिष्ठन्ति तथापि निश्चयेन विशुद्धज्ञान-
दर्शनस्वभावपरमात्मानः सकाशाद्भिन्नस्वरूपेण मुक्तौ तिष्ठन्ति । तथात्र संसारे चेतनाकारणानि
हेयानीति भावार्थः ।।१९।।
अथ —
१४६) दव्वुइँ सयलइँ उवरि ठियइँ णियमेँ जासु वसंति ।
तं णहु दव्वु वियाणि तुहुं जिणवर एउ भणंति ।।२०।।
ऐसा वीतरागदेवने कहा है । यहाँ पर एक बात देखनेकी है कि यद्यपि वज्रवृषभनाराचसंहनन-
रूप पुद्गलद्रव्य मोक्षके गमनका सहायक है, इसके बिना मुक्ति नहीं हो सकती, तो भी
धर्मद्रव्य गति सहायी है, इसके बिना सिद्धलोकको जाना नहीं हो सकता, तथा अधर्मद्रव्य
सिद्धलोकमें स्थितिका सहायी है । लोक – शिखर पर आकाशके प्रदेश अवकाशमें सहायी हैं ।
अनंते सिद्ध अपने स्वभावमें ही ठहरे हुए हैं, परद्रव्यका कुछ प्रयोजन नहीं है । यद्यपि
मुक्तात्माओंके प्रदेश आपसमें एक जगह हैं, तो भी विशुद्ध, ज्ञान, दर्शन, भाव, भगवान्
सिद्धक्षेत्रमें भिन्न – भिन्न स्थित हैं, कोई सिद्ध किसी सिद्धिसे प्रदेशोंकर मिला हुआ नहीं है ।
पुद्गलादि पाँचों द्रव्य जीवको यद्यपि निमित्त कारण कहे गये हैं, तो भी उपादानकारण नहीं
है, ऐसा सारांश हुआ ।।१९।।
अहीं, जोवानुं ए (वात देखवानी)छे के वज्रवृषभनाराचसंहननरूपे पुद्गलद्रव्य
मुक्ति-गमनकाळे सहकारी कारण छे, तेमज धर्मद्रव्य पण गतिमां सहकारी कारण छे, अधर्मद्रव्य
पण लोकाग्रे स्थित थता सिद्धने स्थितिमां सहकारी कारण छे.
जोके आ बधा द्रव्यो मुक्तात्माना प्रदेशमां एकक्षेत्रावगाहे रहे छे तोपण निश्चयथी विशुद्ध
ज्ञान, विशुद्ध दर्शन जेनो स्वभाव छे एवा परमात्माथी तेओ भिन्न भिन्न स्वरूपे मुक्तिमां
रहे छे;
तथा आ संसारमां चेतननां कारणो (निमित्त कारणो) होय छे, एवो भावार्थ छे. पण
(उपादान कारणथी) हेय छे. १९.
२३६ ]
योगीन्दुदेवविरचितः
[ अधिकार-२ः दोहा-२०