Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration).

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adhikAr-1 dohA-77 ]paramAtmaprakAsha [ 133
उस मिथ्यात्व परिणामसे शुद्धात्माके अनुभवसे पराङ्मुख अनेक तरहके कर्मोंको बाँधता है,
जिनसे कि द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव, भावरूपी पाँच प्रकारके संसारमें भटकता है
ऐसा कोई
शरीर नहीं, जो इसने न धारण किया हो, ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, कि जहाँ उपजा न हो, और
मरण किया हो, ऐसा कोई काल नहीं है, कि जिसमें इसने जन्म-मरण न किये हों, ऐसा कोई
भव नहीं, जो इसने पाया न हो, और ऐसे अशुद्ध भाव नहीं हैं, जो इसके न हुए हों
इस
तरह अनंत परावर्तन इसने किये हैं ऐसा ही कथन मोक्षपाहुड़में निश्चय मिथ्यादृष्टिके लक्षणमें
श्रीकुंदकुंदाचार्यने कहा है‘‘जो पुण’’ इत्यादि इसका अर्थ यह है कि जो अज्ञानी जीव
द्रव्यकर्म, भावकर्म, नोकर्मरूप परद्रव्यमें लीन हो रहे हैं, वे साधुके व्रत धारण करने पर भी
मिथ्यादृष्टि ही हैं, सम्यग्दृष्टि नहीं और मिथ्यात्वकर परिणमते दुःख देनेवाले आठ कर्मोंको बाँधते
हैं
फि र भी आचार्यने मोक्षपाहुडमें कहा है‘‘जे पज्जयेसु’’ इत्यादि उसका अर्थ यह है,
कि जो नर नारकादि पर्यायोंमें मग्न हो रहे हैं, वे जीव परपर्यायमें रत मिथ्यादृष्टि हैं, ऐसा
परिणामस्य फलं कथ्यते बंधइ बहुविहकम्मडा जें संसारु भमेइ बध्नाति
बहुविधकर्माणि यैः संसारं भ्रमति, येन मिथ्यात्वपरिणामेन शुद्धात्मोपलब्धेः
प्रतिपक्षभूतानि बहुविधकर्माणि बध्नाति तैश्च कर्मभिर्द्रव्यक्षेत्रकालभवभावरूपं पञ्चप्रकारं
संसारं परिभ्रमतीति
तथा चोक्तं मोक्षप्राभृते निश्चयमिथ्याद्रष्टिलक्षणम्‘‘जो पुणु
परदव्वरओ मिच्छादिट्ठी हवेइ सो साहू मिच्छत्तपरिणदो उण बज्झदि दुट्ठट्ठकम्मेहिं ।।’’
पुनश्चोक्तं तैरेव‘‘जे पज्जएसु णिरदा जीवा परसमइग त्ति णिद्दिट्ठा आदसहावम्मि
ठिदा ते सगसमया मुणेयव्वा ।।’’ अत्र स्वसंवित्तिरूपाद्वीतरागसम्यक्त्वात् प्रतिपक्षभूतं
ATh mad, ATh mal, chha anAyatan e pachchIs doSho jemAn samAy chhe evI mithyA vitath
(khoTI) vyalIk (banAvaTI) draShTi
abhiprAy, ruchi, pratyay, shraddhAnjene chhe te mithyAdraShTi hoy
chhe.
tenA mithyA pariNAmanun phaL kahe chhete anek prakAranAn karmo bAndhe chhe ke jethI
sansAramAn paribhramaN kare chheje mithyAtvapariNAmathI shuddhAtmopalabdhithI pratipakShabhUt bahuvidh karmo
bAndhe chhe, te ja karmothI dravya, kShetra, kAL, bhAvarUp pAnch prakAranA sansAramAn bhame chhe. (shrI
kundakundAchAryadevakRut) mokShaprAbhRut (gAthA 15)mAn nishchayamithyAdraShTinun lakShaN paN kahyun chhe ke
‘‘जो पुणु परदव्वरओ मिच्छादिट्ठी हवेइ सो साहू मिच्छत्तपरिणदो उण बज्झदि दुट्ठट्ठकम्मेहिं’’ (artha
vaLI je paradravyamAn rat chhe te sAdhu mithyAdraShTi hoy chhe, mithyAtvarUpe pariNamelo te duShTa ATh
karmane bAndhe chhe. ) vaLI teoe paN kahyun chhe ke (pravachanasAr 2--94)
‘‘जे पज्जयेसु णिरदा जीवा
परसमयिगत्ति णिदिट्ठा आदसहावम्मि ठिदा ते सगसमया मुणेयव्वा ।। (arthaje jIvo paryAyomAn