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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-1 dohA-80
मिथ्यात्वी जीव वस्तुके स्वरूपको विपरीत जानता है, अपना जो शुद्ध ज्ञानादि सहित स्वरूप
है, उसको मिथ्यात्व रागादिरूप जानता है । उससे क्या करता है ? [कर्मविनिर्मितान् भावान् ]
कर्मोंकर रचे गये शरीरादि परभाव हैं [तान् ] उनको [आत्मानं ] अपने [भणति ] कहता है,
अर्थात् भेदविज्ञानके अभावसे गोरा, श्याम, स्थूल, कृश, इत्यादि कर्मजनित देहके स्वरूपको
अपना जानता है, इसीसे संसारमें भ्रमण करता है । यहाँ पर कर्मोंसे उपार्जन किये भावोंसे भिन्न
जो शुद्ध आत्मा है, उससे जिस समय रागादि दूर होते हैं, उस समय उपादेय है, क्योंकि तभी
शुद्ध आत्माका ज्ञान होता है ।।७९।।
इसके बाद उन पूर्व कथित कर्मजनित भावोंको जिस मिथ्यात्व परिणामसे
बहिरात्मा अपने मानता है, और वे अपने हैं नहीं, ऐसे परिणामोंको पाँच दोहा – सूत्रोंमें
कहते हैं —
कम्मविणिम्मिय भावडा ते अप्पाणु भणेइ कर्मविनिर्मितान् भावान् तानात्मानं भणति,
विशिष्टभेदज्ञानाभावाद्गौरस्थूलकृशादिकर्मजनितदेहधर्मानं जानातीत्यर्थः । अत्र तेभ्यः
कर्मजनितभावेभ्यो भिन्नो रागादिनिवृत्तिकाले स्वशुद्धात्मैवोपादेय इति तात्पर्यार्थः ।।७९।।
अथानन्तरं १तत्पूर्वोक्त कर्मजनितभावान् येन मिथ्यापरिणामेन कृत्वा बहिरात्मा आत्मनि
योजयति तं परिणामं सूत्रपञ्चकेन विवृणोति —
८०) हउँ गोरउ हउँ सामलउ हउँ जि विभिण्णउ वण्णु ।
हउँ तणु-अंगउँ थूलु हउँ एहउँ मूढउ मण्णु ।।८०।।
bhAvArtha — jIv mithyAtvarUpe pariNamato tattvane viparIt jANe chhe-shuddhaAtmAnI
anubhUtinI ruchithI vilakShaN mithyAtvarUpe pariNamato thako jIv paramAtmAdi tattvane ane yathAvat
vastusvarUpane paN viparIt ane rAgAdirUpe pariNamelun jANe chhe, ke jethI te karmathI banelA bhAvone
potArUp kahe chhe – vishiShTa bhedagnAnanA abhAvathI goro, sthUL, kRushAdi evA karmajanit dehanA
dharmone potArUp jANe chhe.
ahIn, te karmajanit bhAvothI bhinna rAgAdinI nivRuttinA samaye svashuddhAtmA ja upAdey
chhe, evo tAtpayArtha chhe. 79.
tyAr pachhI te pUrvokta karmajanit bhAvone je mithyAtvanA pariNAme karIne bahirAtmA
potAmAn joDe chhe te pariNAmanun, pAnch gAthAsUtrothI, kathan kare chhe —
1. pAThAntara — तत् = तान्