Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 82 (Adhikar 1).

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adhikAr-1 dohA-82 ]paramAtmaprakAsha [ 139
८२) तरुणउ बूढउ रूयडउ सूरउ पंडिउ दिव्वु
खवणउ वंदउ सेवडउ मूढउ मण्णइ सव्वु ।।८२।।
तरुणः वृद्धः रूपवान् शूरः पण्डितः दिव्यः
क्षपणकः वन्दकः श्वेतपटः मूढः मन्यते सर्वम् ।।८२।।
तरुणउ बूढउ रूयडउ सूरउ पंडिउ दिव्वु तरुणो यौवनस्थोऽहं वृद्धोऽहं रूपस्व्यहं शूरः
सुभटोऽहं पण्डितोऽहं दिव्योऽहम् पुनश्च किंविशिष्टः खवणउ वंदउ सेवडउ क्षपणको
दिगम्बरोऽहं वन्दको बौद्धोऽहं श्वेतपटादिलिङ्गधारकोऽहमिति मूढात्मा सर्वं मन्यत इति अयमत्र
तात्पर्यार्थः यद्यपि व्यवहारेणाभिन्नान् तथापि निश्चयेन वीतरागसहजानन्दैकस्वभावात्परमात्मनः
भिन्नान् कर्मोदयोत्पन्नान् तरुणवृद्धादिविभावपर्यायान् हेयानपि साक्षादुपादेयभूते स्वशुद्धात्मतत्त्वे
योजयति
कोऽसौ ख्यातिपूजालाभादिविभावपरिणामाधीनतया परमात्मभावनाच्युतः सन्
मूढात्मेति ।।८२।। अथ
bhAvArthakhyAti, pUjA, lAbhAdi vibhAv pariNAmane AdhIn thaIne,
paramAtmabhAvanAthI chyut thato mUDhAtmA jo ke jeo vyavahArathI abhinna chhe topaN nishchayathI
vItarAgasahajAnand jeno ek svabhAv chhe evA paramAtmAthI bhinna chhe. karmodayathI utpanna
taruN, vRuddhAdi vibhAvaparyAyo hey hovA chhatAn paN temane, sAkShAt upAdeyabhUt
nijashuddhAtmatattvamAn yoje chhe (
joDe chhe, sambandh kare chhe.) ahIn A tAtpayArtha chhe. 82.
गाथा८२
अन्वयार्थ :[तरुणः ] मैं जवान हूँ, [वृद्धः ] बुड्ढा हूँ, [रूपस्वी ] रूपवान हूँ,
[शूरः ] शूरवीर हूँ, [पण्डितः ] पंडित हूँ [दिव्यः ] सबमें श्रेष्ठ हूँ [क्षपणकः ] दिगंबर हूँ,
[वन्दकः ] बोद्धमतका आचार्य हूँ [श्वेतपटः ] और मैं श्वेताम्बर हूँ, इत्यादि [सर्वम् ] सब
शरीरके भेदोंको [मूढ़ः ] मूर्ख [मन्यते ] अपना मानता है
ये भेद जीवके नहीं हैं
भावार्थ :यहाँ पर यह है कि, यद्यपि व्यवहारनयकर ये सब तरुण वृद्धादि शरीरके
भेद आत्माके कहे जाते हैं, तो भी निश्चयनयकर वीतराग सहजानंद एक स्वभाव जो परमात्मा
उससे भिन्न हैं
ये तरुणादि विभावपर्याय कर्मके उदयकर उत्पन्न हुए हैं, इसलिये त्यागने योग्य
हैं, तो भी उनको साक्षात् उपादेयरूप निज शुद्धात्म तत्त्वमें जो जो लगाता है, अर्थात् मानता
है, वह अज्ञानी जीव बड़ाई, प्रतिष्ठा, धनका लाभ इत्यादि विभाव परिणामोंके आधीन होकर
परमात्माकी भावनासे रहित हुआ मूढात्मा हैं, वह जीवके ही भाव मानता है
।।८२।।