adhikAr-1 dohA-85 ]paramAtmaprakAsha [ 143
कालु लहेविणु जोइया जिमु जिमु मोहु गलेइ कालं लब्ध्वा हे योगिन् यथा यथा मोहो
विगलति तिमु तिमु दंसणु लहइ जिउ तथा तथा दर्शनं सम्यक्त्वं लभते जीवः । तदनन्तरं किं
करोति । णियमें अप्पु मुणेइ नियमेनात्मानं मनुते जानातीत्यर्थः । तथाहि —
एकेन्द्रियविकलेन्द्रियपञ्चेन्द्रियसंज्ञिपर्याप्तमनुष्यदेशकुलशुद्धात्मोपदेशादीनामुत्तरोत्तरदुर्लभक्रमेण
दुःप्राप्ता काललब्धिः, कथंचित्काकतालीयन्यायेन तां लब्ध्वा परमागमकथितमार्गेण मिथ्यात्वादि-
भेदभिन्नपरमात्मोपलंभप्रतिपत्तेर्यथा यथा मोहो विगलति तथा तथा शुद्धात्मैवोपादेय इति रूचिरूपं
सम्यक्त्वं लभते । शुद्धात्मकर्मणोर्भेदज्ञानेन शुद्धात्मतत्त्वं मनुते जानातीति । अत्र यस्यैवोपादेय-
भूतस्य शुद्धात्मनो रुचिपरिणामेन निश्चयसम्यग्द्रष्टिर्जातो जीवः, स एवोपादेय इति
भावार्थः ।।८५।।
अत ऊर्ध्वं पूर्वोक्त न्यायेन सम्यग्द्रष्टिर्भूत्वा मिथ्याद्रष्टिभावनाया प्रतिपक्षभूतां याद्रशीं
भावार्थ : — एकेन्द्रीसे विकलत्रय (दोइन्द्री, तेइन्द्री, चोइन्द्री) होना दुर्लभ है,
विकलत्रयसे पंचेन्द्री, पंचेन्द्रीसे सैनी पर्याप्त, उससे मनुष्य होना कठिन है । मनुष्यमें भी आर्यक्षेत्र,
उत्तमकुल, शुद्धात्माका उपदेश आदि मिलना उत्तरोत्तर बहुत कठिन हैं, और किसी तरह
‘काकतालीय न्यायसे’ काललब्धिको पाकर सब दुर्लभ सामग्री मिलने पर भी जैन-शास्त्रोक्त
मार्गसे मिथ्यात्वादिके दूर हो जानेसे आत्मस्वरूपकी प्राप्ति होते हुए, जैसा जैसा मोह क्षीण होता
जाता है, वैसा शुद्ध आत्मा ही उपादेय है, ऐसा रुचिरूप सम्यक्त्व होता है । शुद्ध आत्मा और
कर्मको जुदे जुदे जानता है । जिस शुद्धात्माकी रुचिरूप परिणामसे यह जीव निश्चयसम्यग्दृष्टि
होता है, वही उपादेय है, यह तात्पर्य हुआ ।।८५।।
इसके बाद पूर्व कथित रीतिसे सम्यग्दृष्टि होकर मिथ्यात्वकी भावनासे विपरीत जैसी
bhAvArtha — ekendriy, viklendriy, panchendriy, sangnIparyAptamanuShya, AryakShetra, uttamakuL,
shuddha AtmAno upadeshAdi kramathI je uttarottar durlabh hovAthI kALalabdhi duprApta chhe. tene koI
prakAre ‘kAkatAlIy nyAyathI’ pAmIne paramAgamamAn kahelA mArgathI mithyAtvAdi bhedothI bhinna
paramAtmAnI upalabdhi thavAthI, jem jem moh gaLato jAy chhe tem tem ‘shuddha AtmA ja upAdey
chhe’ evun ruchirUp samyaktva jIv pAme chhe, shuddha AtmA ane karmanA bhedagnAnathI shuddha AtmAne
jANe chhe.
ahIn, upAdeyabhUt je shuddha AtmAnI ruchirUp pariNAmathI jIv nishchayasamyagdraShTi thAy
chhe te shuddha AtmA ja upAdey chhe, evo bhAvArtha chhe. 85.
tyAr pachhI pUrvokta nyAyathI samyagdraShTi thaIne mithyAdraShTinI bhAvanAthI pratipakShabhUt jevI