Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 91 (Adhikar 1).

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adhikAr-1 dohA-91 ]paramAtmaprakAsha [ 149
अप्पा माणुसु देउ ण वि अप्पा तिरिउ ण होइ अप्पा णारउ कहिं वि णवि आत्मा
मनुष्यो न भवति देवो नैव भवति आत्मा तिर्यग्योनिर्न भवति आत्मा नारकः क्वापि काले
न भवति
तर्हि किंविशिष्टो भवति णाणिउ जाणइ जोइ ज्ञानी ज्ञानरूपो भवति तमात्मानं
कोऽसो जानाति योगी कोऽर्थः त्रिगुप्तिनिर्विकल्पसमाधिस्थ इति तथाहि विशुद्धज्ञानदर्शन-
स्वभावपरमात्मतत्त्वभावनाप्रतिपक्षभूतैः रागद्वेषादिविभावपरिणामजालैर्यान्युपार्जितानि कर्माणि
तदुदयजनितान् मनुष्यादिविभावपर्यायान् भेदाभेदरत्नत्रयभावनाच्युतो बहिरात्मा स्वात्मतत्त्वे
योजयति
तद्विपरीतोऽन्तरात्मशब्दवाच्यो ज्ञानी पृथक् जानातीत्यभिप्रायः ।।९०।। अथ
९१) अप्पा पंडिउ मुक्खु णवि णवि ईसरु णवि णीसु
तरुणउ बूढउ बालु णवि अण्णु वि कम्म-विसेसु ।।९१।।
भावार्थ :निर्मल ज्ञान दर्शन स्वभाव जो परमात्मतत्त्व उसकी भावनासे उलटे राग-
द्वेषादि विभाव-परिणामोंसे उपार्जन किये जो शुभाशुभ कर्म हैं, उनके उदयसे उत्पन्न हुई
मनुष्यादि विभाव-पर्यायोंको भेदाभेदस्वरूप रत्नत्रयकी भावनासे रहित हुआ मिथ्यादृष्टि जीव
अपने जानता है, और इस अज्ञानसे रहित सम्यग्दृष्टि ज्ञानी जीव उन मनुष्यादि पर्यायोंको अपनेसे
जुदा जानता है
।।९०।।
आगे फि र आत्माका स्वरूप कहते हैं
गाथा९१
अन्वयार्थ :[आत्मा ] चिद्रूप आत्मा [पंडितः ] विद्यावान् व [मूर्खः ] मूर्ख [नैव ]
नहीं है, [ईश्वरः ] धनवान् सब बातोंमें समर्थ भी [नैव ] नहीं है [निःस्वः ] दरिद्री भी [नैव ] नहीं
है, [तरुणः वृद्धः बालः नैव ] जवान, बूढ़ा और बालक भी नहीं है, [अन्यः अपि कर्म विशेषः ]
ये सब पर्यायें आत्मासे जुदे कर्मके विशेष हैं, अर्थात् क र्ममें उत्पन्न हुए विभाव-पर्याय हैं
bhAvArthabhedAbhedaratnatrayanI bhAvanAthI chyut evo bahirAtmA, vishuddhagnAn,
vishuddhadarshan jeno svabhAv chhe evA paramAtmatattvanI bhAvanAthI pratipakShabhUt rAgadveShAdi
vibhAvapariNAmanI jALathI upArjan karavAmAn AvelAn karmonA udayathI thayel manuShyAdi
vibhAvaparyAyone svAtmatattvamAn yoje chhe-joDe chhe, tenAthI viparIt ‘antarAtmA’ shabdathI vAchya
evo gnAnI temane pRuthak jANe chhe. e abhiprAy chhe. 90.
have (pharI AtmAnun svarUp kahe chhe)