Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration).

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adhikAr-1 dohA-92 ]paramAtmaprakAsha [ 151
पुण्यमपि पापमपि कालः नभः धर्माधर्ममपि कायः
एकमपि आत्मा भवति नैव मुक्त्वा चेतनभावम् ।।९२।।
पुएणु वि पाउ वि कालु णहु धम्माधम्मु वि काउ पुण्यमपि पापमपि कालः नभः
आकाशं धर्माधर्ममपि कायः शरीरं, एक्कु वि अप्पा होइ णवि मेल्लिवि चेयणभाउ इदं
पूर्वोक्त मेकमप्यात्मा न भवति
किं कृत्वा मुक्त्वा किं चेतनभावमिति तथाहि
व्यवहारनयेनात्मनः सकाशादभिन्नान् शुद्धनिश्चयेन भिन्नान् हेयभूतान् पुण्य-
पापादिधर्माधर्मान्मिथ्यात्वरागादिपरिणतो बहिरात्मा स्वात्मनि योजयति तानेव पुण्यपापादि
समस्तसंकल्पविकल्पपरिहारभावनारूपे स्वशुद्धात्मद्रव्ये सम्यक्श्रद्धानज्ञानानुचरणरूपाभेद-
रत्नत्रयात्मके परमसमाधौ स्थितोऽन्तरात्मा शुद्धात्मनः सकाशात् पृथग् जानातीति
तात्पर्यार्थः
।।९२।। एवं त्रिविधात्मप्रतिपादकमहाधिकारमध्ये मिथ्याद्रष्टिभावनाविपरीतेन
गाथा९२
अन्वयार्थ :[पुण्यमपि ] पुण्यरूप शुभकर्म [पापमपि ] पापरूप अशुभकर्म
[कालः ] अतीत अनागत वर्तमान काल [नभः ] आकाश [धर्माधर्ममपि ] धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य
[कायः ] शरीर, इनमेंसे [एक अपि ] एक भी [आत्मा ] आत्मा [नैव भवति ] नहीं है,
[चेतनभावम् मुक्तवा ] चेतनभावको छोड़कर अर्थात् एक चेतनभाव ही अपना है
।।
भावार्थ :व्यवहारनयकर यद्यपि पुण्य, पापादि आत्मासे अभिन्न हैं, तो भी
शुद्धनिश्चयनयकर भिन्न हैं, और त्यागने योग्य हैं, उन परभावोंको मिथ्यात्व रागादिरूप परिणत
हुआ बहिरात्मा जानता है, और उन्हींको पुण्य, पापादि समस्त संकल्प, विकल्परहित निज
शुद्धात्मद्रव्यमें सम्यक् श्रद्धान ज्ञान चारित्ररूप अभेदरत्नत्रयस्वरूप परमसमाधिमें तिष्ठता
सम्यग्दृष्टि जीव शुद्धात्मासे जुदे जानता है
।।९२।।
ऐसे बहिरात्मा परमात्मारूप तीन प्रकारके आत्माका जिसमें कथन है, ऐसे पहले
bhAvArthamithyAtva, rAgAdirUpe pariNamelo bahirAtmA vyavahAranayathI AtmAthI
abhinna ane shuddhanishchayanayathI AtmAthI bhinna, heyabhUt evA te puNya, pAp ane
dharmAdharmAdi dravyone potAmAn yoje chhe ane temane ja, puNyapApAdi samasta sankalpa-vikalpanA
tyAganI bhAvanArUp, nijashuddhAtmadravyanAn samyakshraddhAn, samyaggnAn ane samyakAcharaNarUp
abhedaratnatrayAtmak paramasamAdhimAn sthit evo antarAtmA shuddhAtmAthI pRuthak jANe chhe. 92.
e pramANe traN prakAranA AtmAnA pratipAdak mahAdhikAramAn mithyAdraShTinI bhAvanAthI