Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration).

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adhikAr-1 dohA-99 ]paramAtmaprakAsha [ 165
द्वादशाङ्गाध्ययनफलभूते निश्चयरत्नत्रयात्मके परमात्मध्याने तिष्ठन्ति तेन कारणेन
वीतरागस्वसंवेदनज्ञानेन निजात्मनि ज्ञाते सति सर्वं ज्ञातं भवतीति
अथवा
निर्विकल्पसमाधिसमुत्पन्नपरमानन्दसुखरसास्वादे जाते सति पुरुषो जानाति किं जानाति वेत्ति
मम स्वरूपमन्यद्देहरागादिकं परमिति तेन कारणेनात्मनि ज्ञाते सर्वं ज्ञातं भवति अथवा आत्मा
कर्ता श्रुतज्ञानरूपेण व्याप्तिज्ञानेन करणभूतेन सर्वं लोकालोकं जानाति तेन कारणेनात्मनि ज्ञाते
सर्वं ज्ञातं भवतीति
अथवा वीतरागनिर्विकल्पत्रिगुप्तिसमाधिबलेन केवलज्ञानोत्पत्तिबीजभूतेन
केवलज्ञाने जाते सति दर्पणे बिम्बवत् सर्वं लोकालोकस्वरूपं विज्ञायत इति हेतोरात्मनि ज्ञाते
सर्वं ज्ञातं भवतीति अत्रेदं व्याख्यानचतुष्टयं ज्ञात्वा बाह्याभ्यन्तरपरिग्रहत्यागं कृत्वा सर्वतात्पर्येण
निजशुद्धात्मभावना कर्तव्येति तात्पर्यम्
तथा चोक्तं समयसारे‘‘जो पस्सइ अप्पाणं
अबद्धपुट्ठं अणण्णमविसेसं अपदेससुत्तमज्झं पस्सइ जिणसासणं सव्वं ।।’’ ।।९९।।
हुआ जो परमानंद सुखरस उसके आस्वाद होने पर ज्ञानी पुरुष ऐसा जानता है, कि मेरा स्वरूप
जुदा है, और देह रागादिक मेरेसे दूसरे हैं, मेरे नहीं हैं, इसलिये आत्माके (अपने) जाननेसे
सब भेद जाने जाते हैं, जिसने अपनेको जान लिया, उसने अपनेसे भिन्न सब पदार्थ जाने
अथवा
आत्मा श्रुतज्ञानरूप व्याप्तिज्ञानसे सब लोकालोकको जानता है, इसलिये आत्माके जाननेसे सब
जाना गया
अथवा वीतरागनिर्विकल्प परमसमाधिके बलसे केवलज्ञानको उत्पन्न (प्रगट) करके
जैसे दर्पणमें घट पटादि पदार्थ झलकते हैं, उसी प्रकार ज्ञानरूपी दर्पणमें सब लोक-अलोक
भासते हैं
इससे यह बात निश्चय हुई, कि आत्माके जाननेसे सब जाना जाता है यहाँ पर सारांश
यह हुआ, कि इन चारों व्याख्यानोंका रहस्य जानकर बाह्य अभ्यंतर सब परिग्रह छोड़कर सब
तरहसे अपने शुद्धात्माकी भावना करनी चाहिये
ऐसा ही कथन समयसारमें श्रीकुंदकुंदाचार्यने
किया है ‘‘जो पस्सइ’’ इत्यादिइसका अर्थ यह है, कि जो निकट-संसारी जीव स्वसंवेदन-
ज्ञानकर अपने आत्माको अनुभवता, सम्यग्दृष्टिपनेसे अपनेको देखता है, वह सब जैनशासनको
देखता है, ऐसा जिनसूत्रमें कहा है
कैसा वह आत्मा है ? रागादिक ज्ञानावरणादिकसे रहित है,
traNaguptiyukta samAdhinA baLathI kevaLagnAn utpanna thatAn, jevI rIte darpaNamAn padArtho pratibimbit
thAy chhe tevI rIte sarvalokanun svarUp jaNAy chhe. e kAraNe AtmAne jANatAn, sarva jaNAyun.
ahIn, A chAr prakAranun vyAkhyAn jANIne, bAhya abhyantar parigrahano tyAg karIne, sarva
tAtparyathI nij shuddhAtmAnI bhAvanA kartavya chhe, evo bhAvArtha chhe. shrI samayasAr (gAthA 15)mAn
paN kahyun chhe ke
‘‘जो पस्सइ अप्पाणं अबद्धपुट्ठं अणण्णमविसेसं अपदेससुत्तमज्झं पस्सइ जिणसासणं
सव्वं ।। arthaje puruSh AtmAne abaddhaspRuShTa, ananya, avisheSh (tathA upalakShaNathI niyat
ane asanyukta) dekhe chhe te sarva jinashAsanane dekhe chhe-ke je jinashAsan bAhya dravyashrut tem ja