Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 107 (Adhikar 1).

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174 ]
yogIndudevavirachita
[ adhikAr-1 dohA-107
ण णाणु तेऽपि भवन्ति न ज्ञानं, तेन कारणेन तुहुं तिण्णि वि परिहरिवि तान् कर्मतापन्नान्
तत्र हे प्रभाकरभट्ट त्रीण्यपि परिहृत्य
पश्चात्किं कुरु णियमिं अप्पु वियाणु निश्चयेनात्मानं
विजानीहीति तद्यथा सकलविशदैकज्ञानस्वरूपात् परमात्मपदार्थात् निश्चयनयेन भिन्नान्
त्रीण्यपि धर्मार्थकामान् त्यक्त्वा वीतरागस्वसंवेदनलक्षणे शुद्धात्मानुभूतिज्ञाने स्थित्वात्मानं
जानीहीति भावार्थः
।।१०६।।
अथ
१०७) अप्पा णाणहँ गम्मु पर णाणु वियाणइ जेण
तिण्णि वि मिल्लिवि जाणि तुहुँ अप्पा णाणेँ तेण ।।१०७।।
आत्मा ज्ञानस्य गम्यः परः ज्ञानं विजानाति येन
त्रीण्यपि मुक्त्वा जानीहि त्वं आत्मानं ज्ञानेन तेन ।।१०७।।
अप्पा णाणहं गम्मु पर आत्मा ज्ञानस्य गम्यो विषयः परः कोऽर्थः नियमेन
(विषयाभिलाष) ये तीनों ही आत्मासे भिन्न हैं, ज्ञानरूप नहीं हैं निश्चयनय करके सब तरफ से
निर्मल केवलज्ञानस्वरूप परमात्मपदार्थसे भिन्न तीनों ही धर्म, अर्थ, काम, पुरुषार्थोंको छोड़कर
वीतरागस्वसंवेदनस्वरूप शुद्धात्मानुरूपज्ञानमें रहकर आत्माको जान
।।१०६।।
आगे आत्माका स्वरूप दिखलाते हैं
गाथा१०७
अन्वयार्थ :[आत्मा ] आत्मा [परं ] नियमसे [ज्ञानस्य ] ज्ञानके [गम्यः ] गोचर
है, [येन ] क्योंकि [ज्ञानं ] ज्ञान ही [विजानाति ] आत्माको जानता है, [तेन ] इसलिये [त्वं ]
हे प्रभाकर भट्ट तू [त्रीणि अपि मुक्तवा ] धर्म, अर्थ, काम इन तीनों ही भावोंको छोड़कर
[ज्ञानेन ] ज्ञानसे [आत्मानं ] निज आत्माको [जानीहि ] जान
भावार्थ :निज शुद्धात्मा ज्ञानके ही गोचर (जानने योग्य) है, क्योंकि मतिज्ञानादि
dharma artha ane kAm e traNey puruShArthane chhoDIne vItarAg svasamvedan jenun svarUp chhe evA
shuddhAtmAnI anubhUtirUp gnAnamAn sthit thaIne AtmAne jAN, e bhAvArtha chhe. 106.
have, AtmAnun svarUp darshAve chhe
bhAvArthanij shuddhAtmA gnAnane ja gamya chhe, kAraN ke matignAnAdi pAnch bhedo rahit