adhikAr-1 dohA-110 ]paramAtmaprakAsha [ 179
मुक्तात्मा लोकाग्रे तिष्ठति स एव ब्रह्मलोकः स एव विष्णुलोकः स एव शिवलोको नान्यः
कोऽपीति भावार्थः ।।१०९।। अथ —
११०) मुणि-वर-विंदहँ हरि-हरहं जो मणि णिवसइ देउ ।
परहँ जि परतरु णाणमउ सो वुच्चइ पर-लोउ ।।११०।।
मुनिवरवृन्दानां हरिहराणां यः मनसि निवसति देवः ।
परस्माद् अपि परतरः ज्ञानमयः स उच्यते परलोकः ।।११०।।
मुणिवरविंदहं हरिहरहं मुनिवरवृन्दानां हरिहराणां च जो मणि णिवसइ देउ योऽसौ
मनसि निवसति देवः आराध्यः । पुनरपि किंविशिष्टः । परहं जि परतरु णाणमउ
परस्मादुत्कृष्टादपि अथवा परहं जि बहुवचनं परेभ्योऽपि सकाशादतिशयेन परः परतरः ।
कोई भी ब्रह्मलोक, विष्णुलोक, शिवलोक नहीं है , ये सब निर्वाणक्षेत्रके नाम हैं, और ब्रह्मा,
विष्णु, शिव ये सब सिद्धपरमेष्ठीके नाम हैं । भगवान् तो व्यक्तिरूप परमात्मा हैं, तथा वह जीव
शक्तिरूप परमात्मा है । इसमें संदेह नहीं है । जितने भगवान्के नाम हैं, उतने सब शक्तिरूप
इस जीवके नाम हैं । यह जीव ही शुद्धनयकर भगवान् है ।।१०९।।
आगे ऐसा कहते हैं कि भगवान्का ही नाम परलोक है —
गाथा – ११०
अन्वयार्थ : — [यः ] जो आत्मदेव [मुनिवरवृन्दानां हरिहराणां ] मुनिश्वरोंके समूहके
तथा इन्द्र वा वासुदेव रुद्रोंके [मनसि ] चित्तमें [निवसति ] बस रहा है, [सः ] वह [परस्माद्
अपि परतरः ] उत्कृष्टसे भी उत्कृष्ट [ज्ञानमयः ] ज्ञानमयी [परलोकः ] परलोक [उच्यते ]
कहा जाता है ।
भावार्थ : — परलोक शब्दका अर्थ ऐसा है कि पर अर्था त् उत्कृष्ट वीतराग चिदानंद
शुद्ध स्वभाव आत्मा उसका लोक अर्थात् अवलोकन निर्विकल्पसमाधिमें अनुभवना वह
ahIn, A artha chhe ke muktAtmA je lokanA agrabhAgamAn birAje chhe te ja brahmalok
chhe, te ja viShNulok chhe, te ja shivalok chhe, bIjo koI paN nahi, evo bhAvArtha chhe. 109.
have, paramAtmA paralok chhe, em kahe chhe —
bhAvArtha — par arthAt utkRuShTa vItarAg chidAnand jeno ek svabhAv chhe evo AtmA
teno lok arthAt tenun avalokan athavA nirvikalpa samAdhimAn tenun anubhavan evo ‘paralok’