Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration).

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adhikAr-1 dohA-111 ]paramAtmaprakAsha [ 181
सो पर वुच्चइ लोउ परु स परः नियमेनोच्यते लोको जनः कथंभूतो भण्यते
पर उत्कृष्टः स कः जसु मइ तित्थु वसेइ यस्य भव्यजनस्य मतिर्मनश्चित्तं तत्र
निजपरमात्मस्वरूपे वसति विषयकषायविकल्पजालत्यागेन स्वसंवेदनसंवित्तिस्वरूपेण
स्थिरीभवतीति
यस्य परमात्मतत्त्वे मतिस्तिष्ठति स कस्मात्परो भवतीति चेत् जहिं मइ
तहिं जीवहं जि णियमें जेण हवेइ येन कारणेन यत्र स्वशुद्धात्मस्वरूपे मतिस्तत्रैव गतिः
कस्यैव जीवजीवस्यैव अथवा बहुवचनपक्षे जीवानामेव निश्चयेन भवतीति अयमत्र
भावार्थः यद्यार्तरौद्राधीनतया स्वशुद्धात्मभावनाच्युतो भूत्वा परभावेन परिणमति तदा
दीर्घसंसारी भवति, यदि पुनर्निश्चयरत्नत्रयात्मके परमात्मतत्त्वे भावनां करोति तर्हि निर्वाणं
प्राप्नोति इति ज्ञात्वा सर्वरागादिविकल्पत्यागेन तत्रैव भावनां कर्तव्येति
।।१११।। अथ
लोकः ] उत्कृष्ट जन [उच्यते ] कहा जाता है अर्थात् जिसकी बुद्धि निजस्वरूपमें ठहर रही
है, वह उत्तम जन है, [येन ] क्योंकि [यत्र मतिः ] जैसी बुद्धि होती है, [तत्र ] वैसी [एव ]
ही [जीवस्य ] जीवकी [गतिः ] गति [नियमेन ] निश्चयनयकर [भवति ] होती है, ऐसा
जिनवरदेवने कहा है
अर्थात् शुद्धात्मस्वरूपमें जिस जीवकी बुद्धि होवे, उसको वैसी ही गति
होती है, जिन जीवोंका मन निज-वस्तुमें है, उनको निज-पदकी प्राप्ति होती है, इसमें संदेह
नहीं है
भावार्थ :जो आर्तध्यान रौद्रध्यानकी आधीनतासे अपने शुद्धात्माकी भावनासे
रहित हुआ रागादिक परभावोंस्वरूप परिणमन करता है, तो वह दीर्घसंसारी होता है, और
जो निश्चयरत्नत्रयस्वरूप परमात्मतत्त्वमें भावना करता है, तो वह मोक्ष पाता है
ऐसा
जानकर सब रागादि विकल्पोंको त्यागकर उस परमात्मतत्त्वमें ही भावना करनी
चाहिये
।।१११।।
bhAvArthaje bhavya jIvanI mati-man-chitta nijaparamAtma-svarUpamAn vase chhe arthAt
viShayakaShAy vikalpajALanA tyAgathI svasamvedanasamvittisvarUp vaDe jenI mati sthir thaI chhe tene
niyamathI paralok-utkRuShTa jan-kahevAmAn Ave chhe. kAraN ke je svashuddhAtmasvarUpamAn jIvanI athavA
jIvonI mati hoy chhe tyAn gati nishchayathI thAy chhe.
ahIn A bhAvArtha chhe. je ArtadhyAn ane raudradhyAnane AdhIn thavAthI svashuddhAtmabhAvanAthI
chyut thaIne parabhAvarUpe pariName chhe te dIrgha sansArI thAy chhe ane jo nishchayaratnatrayAtmak
paramAtmatattvamAn bhAvanA kare chhe te nirvAN pAme chhe em jANIne sarva rAgAdi vikalpajALano tyAg
karIne temAn ja (paramAtma-tattvamAn ja) bhAvanA karavI joIe. 111.