गाथामाह — ‘‘जं पुण सगयं तच्चं सवियप्पं होइ तह य अवियप्पं । सवियप्पं सासवयं णिरासवं
विगय संकप्पं ।’’ ।।१४।। एवं पूर्वोक्तै कोनविंशतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये निश्चय-
व्यवहारमोक्षमार्गप्रतिपादनरूपेण सूत्रत्रयं गतम् । इदानीं चतुर्दशसूत्रपर्यन्तं व्यवहारमोक्ष-
मार्गप्रथमावयवभूतव्यवहारसम्यक्त्वं मुख्यवृत्त्या प्रतिपादयति । तद्यथा —
१४१) दव्वइँ जाणइ जहठियइँ तह जगि मण्णइ जो जि ।
अप्पहँ केरउ भावडउ अविचलु दंसणु सो जि ।।१५।।
द्रव्याणि जानाति यथास्थितानि तथा जगति मन्यते य एव ।
आत्मनः सम्बन्धी भावः अविचलः दर्शनं स एव ।।१५।।
कथनमें यह गाथा कही है कि ‘‘जं पुण सगयं’’ इत्यादि । इसका सारांश यह है कि जो
आत्मतत्त्व है, वह भी सविकल्प-निर्विकल्पके भेदसे दो प्रकारका है, जो विकल्प सहित है,
वह तो आस्रव सहित है, और जो निर्विकल्प है, वह आस्रव रहित है ।।१४।।
इस तरह पहले महास्थलमें अनेक अंतस्थलोंमेंसे उन्नीस दोहोंके स्थलमें तीन दोहोंसे
निश्चय व्यवहार मोक्ष – मार्गका कथन किया ।
आगे चौदह दोहापर्यंत व्यवहारमोक्ष – मार्गका पहला अंग व्यवहारसम्यक्त्वको मुख्यतासे
कहते हैं —
गाथा – १५
अन्वयार्थ : — [य एव ] जो [द्रव्याणि ] द्रव्योंको [यथास्थितानि ] जैसा उनका
स्वरूप है, वैसा [जानाति ] जानें, [तथा ] और उसी तरह [जगति ] इस जगतमें [मन्यते ]
gAthA (shrI devasenakRut shrI tattvasAr gAthA 5)mAn paN kahyun chhe ke ‘‘जं पुण सगयं तच्वं सवियप्पं
होइ तह य अवियप्पं । सवियप्पं सासवयं णिरासवं विगय संकप्पं ।।’’ (artha — vaLI je Atmatattva
chhe te paN savikalpa ane nirvikalpanA bhedathI be prakAranun chhe. temAn je savikalpa chhe te to Asrav
sahit chhe ane je nirvikalpa chhe te Asrav rahit chhe.) 14.
e pramANe pUrvokta ogaNIs sUtronA mahAsthaLamAn nishchayavyavahAr mokShamArganA
pratipAdanarUpe traN sUtro samApta thayAn.
have, chaud sUtro sudhI vyavahAramokShamArganA pratham angabhUt vyavahArasamyaktvanI mukhyatAthI
kathan kare chhe, te A pramANe —
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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-15