Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 23 (Adhikar 2).

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मध्ये सिद्धा एव, परमार्थेन तु मिथ्यात्वरागादिविभावपरिणामनिवृत्तिकाले स्वशुद्धात्मैवोपादेय
इत्युपादेयपरंपरा ज्ञातव्येति भावार्थः
।।२२।।
अथ जीवपुद्गलौ सक्रियौ धर्माधर्माकाशकालद्रव्याणि निःक्रियाणीति प्रति-
पादयति
१४९) दव्व चयारि वि इयर जिय गमणागमण-विहीण
जीउ वि पुग्गलु परिहरिवि पभणहिँ णाण-पवीण ।।२३।।
द्रव्याणि चत्वारि अपि इतराणि जीव गमनागमनविहीनानि
जीवमपि पुद्गलं परिहृत्य प्रभणन्ति ज्ञानप्रवीणाः ।।२३।।
दव्व इत्यादि दव्व द्रव्याणि कतिसंख्योपेतानि एव चयारि वि चत्वार्येव इयर
जीवपुद्गलाभ्यामितराणि जिय हे जीव कथंभूतान्येतानि गमणागमण-विहीण गमना-
और निश्चयनयकर मिथ्यात्वरागादि विभावपरिणामके अभावमें विशुद्धात्मा ही उपादेय है, ऐसा
जानना
।।२२।।
आगे जीव पुद्गल ये दोनों चलनहलनादि क्रियायुक्त हैं, और धर्म, अधर्म, आकाश,
काल ये चारों निःक्रिय हैं, ऐसा निरूपण करते हैं
गाथा२३
अन्वयार्थ :[जीव ] हे हंस, [जीवं अपि पुद्गलं ] जीव और पुद्गल इन दोनोंको
[परिहृत्य ] छोड़कर [इतराणि ] दूसरे [चत्वारि एव द्रव्याणि ] धर्मादि चारों ही द्रव्य
[गमनागमनविहीनानि ] चलन हलनादि क्रिया रहित हैं, जीव पुद्गल क्रियावंत हैं, गमनागमन
करते हैं, ऐसा [ज्ञानप्रवीणाः ] ज्ञानियोंमें चतुर रत्नत्रयके धारक केवली श्रुतकेवली [प्रणभंति ]
कहते हैं
भावार्थ :जीवोंके संसारअवस्थामें इस गतिसे अन्य गतिके जानेको कर्म-नोकर्म
upAdey chhe. e pramANe upAdeyanI paramparA jANavI, evo bhAvArtha chhe. 22.
have, jIv ane pudgal e be dravyo sakriy chhe. dharma, adharma, AkAsh ane kAL
e chAr dravyo niShkriy chhe, em kahe chhe
bhAvArthakarmanokarmarUp pudgalo sansAr avasthAmAn jIvone gatimAn sahakArI
242 ]
yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-23