१८०) बंधहँ मोक्खहँ हेउ णिउ जो णवि जाणइ कोइ ।
सो पर मोहिं करइ जिय पुण्णु वि पाउ वि दोइ ।।५३।।
बन्धस्य मोक्षस्य हेतुः निजः यः नैव जानाति कश्चित् ।
स परं मोहेन करोति जीव पुण्यमपि पापमपि द्वे अपि ।।५३।।
बंधहं इत्यादि । बंधहं बन्धस्य मोक्खहं मोक्षस्य हेउ हेतुः कारणम् । कथंभूतम् । णिउ
निजविभावस्वभावहेतुस्वरूपम् । जो णवि जाणइ कोइ यो नैव जानाति कश्चित् । सो पर स
एव मोहिं मोहेन करइ करोति जिय हे जीव पुण्णु वि पाउ वि पुण्यमपि पापमपि ।
कतिसंख्योपेते अपि । दो द्वे अपीति । तथाहि । निजशुद्धात्मानुभूतिरुचिविपरीतं मिथ्यादर्शनं
स्वशुद्धात्म-प्रतीतिविपरीतं मिथ्याज्ञानं निजशुद्धात्मद्रव्यनिश्चलस्थितिविपरीतं मिथ्याचारित्रमित्येतत्रयं
कारणं, तस्मात् त्रयाद्विपरीतं भेदाभेदरत्नत्रयस्वरूपम् मोक्षस्य कारणमिति योऽसौ न जानाति
je koI nishchayanayathI vibhAvapariNAm bandhano hetu chhe ane svabhAvapariNAm mokShano
hetu chhe, em jANato nathI, te ja puNya ane pAp bannene kare chhe paN bIjo nahi. (paN
je koI nishchayanayathI vibhAvapariNAm bandhano hetu chhe ane svabhAvapariNAm mokShano hetu chhe,
em jANe chhe te puNya, pAp bannene karato nathI) em manamAn rAkhIne A sUtra kahe chhe —
bhAvArtha — nijashuddhAtmAnI anubhUtirUp ruchithI viparIt mithyAdarshan, sva-shuddhAtmAnI
pratItithI viparIt mithyAgnAn ane nijashuddhAtmadravyamAn nishchal sthitithI viparIt mithyAchAritra
– e traN bandhanun kAraN chhe ane traNeyathI viparIt evun bhedAbhed ratnatrayasvarUp mokShanun kAraN
chhe, em je koI jANato nathI te ja – jo ke puNya ane pAp banney nishchayanayathI hey chhe
adhikAr-2 dohA-53 ]paramAtmaprakAsha [ 307
गाथा – ५३
अन्वयार्थ : — [यः कश्चित् ] जो कोई जीव [बंधस्य मोक्षस्य हेतुः ] बंध और
मोक्षका कारण [निजः ] अपना विभाव और स्वभाव परिणाम है, ऐसा भेद [नैव जानाति ]
नहीं जानता है, [स एव ] वही [पुण्यमपि पापमपि ] पुण्य और पाप [द्वे अपि ] दोनोंको ही
[मोहेन ] मोहसे [करोति ] करता है ।
भावार्थ : — निज शुद्धात्माकी अनुभूतिकी रुचिसे विपरीत जो मिथ्यादर्शन, निज
शुद्धात्माके ज्ञानसे विपरीत मिथ्याज्ञान, और निज शुद्धात्मद्रव्यमें निश्चल स्थिरतासे उल्टा जो
मिथ्याचारित्र इन तीनोंको बंधका कारण और इन तीनोंसे रहित भेदाभेद रत्नत्रयस्वरूप मोक्षका